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दोस्त की चुदक्कड़ माँ को चोदा अकेले में रात भर: Antarvasana

22 hours ago
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बात तब की है जब मैं पटना में रहता था और मेरी उम्र 22 साल थी। मेरा दोस्त राहुल मेरा बचपन का दोस्त था, और उसकी माँ श्रीमती शकुंतला देवी, जिन्हें सब शकुंतला आंटी कहते थे, उनकी उम्र उस समय 39 साल थी। वो दिखने में इतनी सुंदर और जवान थीं कि कोई भी उन्हें देखकर उनकी असली उम्र का अंदाज़ा नहीं लगा सकता था। उनका शरीर ऐसा था जैसे किसी ने गढ़ा हो, गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आँखें, घने काले बाल और होंठ जो हमेशा हल्की मुस्कान से भरे रहते थे।


राहुल के पिता जी अक्सर बाहर रहते थे, किसी सरकारी नौकरी में थे और महीने में मुश्किल से दो-चार दिन ही घर आते थे। इसलिए राहुल और उसकी माँ ही ज़्यादातर अकेले रहते थे। मैं अक्सर उनके घर जाता था, और शकुंतला आंटी मुझे बहुत प्यार करती थीं। वो मुझे बेटे की तरह मानती थीं, लेकिन मेरी नज़रें अक्सर उनके शरीर पर टिक जाती थीं। उनकी साड़ी का पल्लू जब सरकता, तो उनकी गहरी नाभि और कमर का हिस्सा दिखाई देता। जब वो झुककर कुछ उठातीं, तो उनके स्तनों की गहराई साफ झलकती। मैं अपने दोस्त की माँ के बारे में ऐसा सोचकर खुद को कोसता था, लेकिन अन्तर्वासना की यही तो खासियत है, दिमाग जितना रोके, शरीर उतना ही बागी होता जाता है।


उस दिन की शाम थी जब यह सब शुरू हुआ। राहुल ने मुझे बताया कि उसे अचानक अपने मामा के यहाँ जाना पड़ रहा है किसी ज़रूरी काम से, और उसकी माँ घर पर अकेली रह जाएँगी। उसने कहा, |यार अर्जुन, मैं दो दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ, माँ घर पर अकेली हैं। तू अगर आज रात यहीं रुक जाए तो मुझे थोड़ी दिलासा रहेगी।| मैंने तुरंत हाँ कर दी, हालाँकि मेरे अंदर एक अलग ही हलचल शुरू हो चुकी थी। मैं सोच रहा था कि आज रात मैं और शकुंतला आंटी अकेले होंगे। यह सोचकर ही मेरे शरीर में एक गर्म लहर दौड़ गई। शाम को जब मैं उनके घर पहुँचा, तो आंटी ने बड़े प्यार से मेरा स्वागत किया। उन्होंने हल्के नीले रंग की कॉटन साड़ी पहनी हुई थी, जो उनके सुडौल शरीर पर बहुत अच्छी लग रही थी।

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रात का खाना हमने साथ में खाया। खाने के दौरान आंटी मुझसे बातें करती रहीं, मेरी पढ़ाई, मेरी जॉब, मेरी गर्लफ्रेंड के बारे में पूछती रहीं। मैंने हँसकर कहा कि मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है। इस पर वो थोड़ा मुस्कुराईं और बोलीं, |तुम जैसे सुंदर लड़के को तो कोई भी लड़की मिल जाएगी।| उनकी इस बात पर मैं शरमा गया। खाने के बाद हम लिविंग रूम में बैठे और टीवी देखने लगे। बाहर बारिश तेज़ होने लगी थी, बिजली चमक रही थी और हवा तेज़ चल रही थी। मौसम भी जैसे उस रात कुछ खास करवट ले रहा था। आंटी ने कहा, |अच्छा हुआ तुम आ गए, वरना ऐसे मौसम में मुझे डर लगता।| मैंने कहा, |कोई बात नहीं आंटी, मैं हूँ न।| यह कहते हुए मेरी आवाज़ थोड़ी काँप गई, क्योंकि उस वक्त मेरी नज़रें उनके पैरों की ओर गई थीं, जो साड़ी के नीचे से हल्के से दिख रहे थे।


कुछ देर बाद बिजली चली गई। पूरा घर अंधेरे में डूब गया। आंटी घबरा गईं, |अरे, ये क्या हुआ?| मैंने कहा, |आप घबराइए मत, मैं मोमबत्ती ढूंढता हूँ।| मैं उठा और अंधेरे में टटोलते हुए रसोई की ओर गया। तभी मुझे याद आया कि मोमबत्ती तो अलमारी के ऊपर रखी है। मैं वापस लौटा और आंटी से टकरा गया। अंधेरे में हमारा शरीर एक दूसरे से छू गया। उनके मुलायम हाथ मेरी छाती से टकराए और उनके स्तन मेरे शरीर से दबे। एक पल के लिए हम दोनों वहीं रुक गए। न उन्होंने हटने की कोशिश की, न मैंने। फिर धीरे से मेरे हाथ उनकी कमर पर चले गए। उन्होंने हल्की सी सिसकी ली और फिर मुझसे सट गईं।


मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह सब सच में हो रहा है या सिर्फ मेरी अन्तर्वासना मुझे भ्रम दिखा रही है। आंटी ने धीरे से मेरे बालों में हाथ फेरा और बोलीं, |अर्जुन, तुम्हें पता है, तुम जब भी यहाँ आते हो, मुझे बहुत अच्छा लगता है।| उनकी आवाज़ में एक अलग ही नर्मी थी, एक अलग ही लालसा। मैंने कहा, |आंटी, मुझे भी आपके पास आना बहुत पसंद है।| फिर मैंने हिम्मत जुटाई और उनके गाल पर हल्का सा चुम्बन ले लिया। वो सिहर उठीं। उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया और मेरे होंठों को अपने होंठों से छू लिया। पहले हल्का सा, फिर गहरा चुम्बन। हमारी साँसें एक हो गईं। उनके होंठ बहुत मुलायम थे, और उनमें खाने की हल्की मिठास घुली थी।


हम कब लिविंग रूम से सटे हुए कमरे में पहुँच गए, पता ही नहीं चला। अंधेरे में ही आंटी ने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए। मैंने भी उनकी साड़ी का पल्लू सरकाया। उनका ब्लाउज़ उनके भरे हुए स्तनों को कसकर पकड़े हुए था। मैंने उनके गले पर होंठ रखे, फिर धीरे-धीरे नीचे उनकी छाती की ओर बढ़ा। उन्होंने मेरे बालों को सहलाते हुए मुझे और पास खींच लिया। उनकी साड़ी अब तक कमर तक सरक चुकी थी। मैंने उनके ब्लाउज़ के पीछे हाथ डालकर उसके हुक खोले। जैसे ही ब्लाउज़ ढीला हुआ, उनके स्तन आज़ाद हो गए। मैंने उन्हें अपने हाथों में लिया और धीरे से दबाने लगा। आंटी के मुँह से आह निकली, |आआह्ह्ह… अर्जुन…| उनकी यह आवाज़ सुनकर मेरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई।


मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया। खिड़की से हल्की चाँदनी अब अंदर आ रही थी, जिसमें उनका चेहरा और भी सुंदर लग रहा था। उनके स्तन गोल, गोरे और बड़े थे, जिनके सिरे गहरे भूरे थे। मैंने उनके एक स्तन को मुँह में लिया और चूसने लगा। आंटी ज़ोर से कराह उठीं, |उह्ह्ह्ह… बेटा… ये क्या कर रहे हो…| लेकिन उनके हाथ मेरे सिर को और दबा रहे थे। मैं बारी-बारी से दोनों स्तनों को चूसता रहा, उन्हें दाँतों से हल्का-हल्का काटता रहा। आंटी की साँसें तेज़ हो चुकी थीं, उनका शरीर गर्म हो रहा था। मैंने उनकी नाभि पर ज़ुबान घुमाई, फिर धीरे-धीरे उनके पेट के निचले हिस्से की ओर बढ़ा। उनकी साड़ी अब तक पूरी तरह से अलग हो चुकी थी, सिर्फ उनकी पेटीकोट और अंदर की कच्छी बाकी थी।


मैंने उनकी पेटीकोट की डोरी खोली और उसे नीचे खींच लिया। अब आंटी सिर्फ अपनी कच्छी में थीं। उनकी जाँघें गोरी और मोटी थीं, जो मोमबत्ती की हल्की रोशनी में चमक रही थीं। मैंने उनकी जाँघों के बीच अपना चेहरा रखा और उनकी कच्छी के ऊपर से ही उनकी योनि को सूँघने लगा। आंटी ने मेरे बाल पकड़ लिए और शर्म से अपना मुँह दूसरी ओर कर लिया। मैंने उनकी कच्छी को सरकाया और उनकी चुत को अपनी ज़ुबान से छू लिया। आंटी ज़ोर से चीख पड़ीं, |आआअह्ह्ह्हह… अर्जुन… मत करो… मैं…| लेकिन मैंने उनकी एक न सुनी। मेरी ज़ुबान उनकी चुत के होंठों को चाट रही थी, ऊपर से नीचे तक, धीरे-धीरे। उनका रस बहने लगा था, जिसे मैं पी रहा था। मैंने उनकी चुत के अंदर अपनी जीभ डाली और उसे हिलाने लगा। आंटी का शरीर बिस्तर पर तड़प रहा था, उनकी जाँघें मेरे सिर को दबोचे हुए थीं।


कुछ देर तक मैं उनकी चुत चाटता रहा, फिर उन्होंने मुझे ऊपर खींच लिया और कहा, |अब मैं तुम्हें देखना चाहती हूँ।| उन्होंने मेरी पैंट खोली और मेरा लंड बाहर निकाला। मेरा लंड पूरी तरह से तना हुआ था, गर्म और सख़्त। आंटी उसे देखकर कुछ पल रुकीं, फिर धीरे से उस पर थूक लगाया और अपने हाथ से सहलाने लगीं। उनका हाथ मुलायम और गर्म था। वो मेरे लंड को ऊपर से नीचे तक धीरे-धीरे रगड़ रही थीं। मैंने आँखें बंद कर लीं और आनंद लेने लगा। फिर आंटी ने मेरे लंड को अपने मुँह में ले लिया। उनके गर्म होंठों ने मेरे लंड को घेर लिया और वो उसे चूसने लगीं। मैं ज़ोर से कराह उठा, |आआह्ह्ह… आंटी…| उन्होंने मेरे लंड को गहराई तक मुँह में लिया और अपना सिर आगे-पीछे करने लगीं। उनकी जीभ मेरे लंड के सिरे पर घूम रही थी, और वो अपने हाथ से मेरे गोलों को सहला रही थीं।


मैं उन्हें अब और नहीं रोक पा रहा था। मैंने उन्हें उठाया और बिस्तर पर लिटाकर उनके ऊपर आ गया। आंटी ने अपनी टाँगें फैला लीं और मेरा लंड पकड़कर अपनी चुत के मुहाने पर रख लिया। मैंने धीरे से अपना लंड उनकी चुत में डाला। आंटी ज़ोर से कराहीं, |आआअह्ह्ह्हह… धीरे से…| उनकी चुत अंदर से बहुत गर्म और गीली थी। मैंने अपना लंड धीरे-धीरे अंदर धकेला, पहले आधा, फिर पूरा। आंटी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और मेरे कंधों को पकड़ लिया। मैं उन्हें चोदने लगा, धीरे-धीरे, आराम से। हर बार जब मैं अपना लंड अंदर ले जाता, आंटी के मुँह से गहरी सिसकी निकलती। उनके स्तन मेरे हर धक्के के साथ हिल रहे थे।


मैंने अपनी गति तेज़ कर दी। बिस्तर चरमराने लगा। आंटी के मुँह से अब लगातार आवाज़ें निकल रही थीं, |उह्ह्ह्ह… अर्जुन… और… और तेज़…| मैंने उनके पैरों को उठाकर अपने कंधों पर रख लिया और गहराई से चोदने लगा। मेरा लंड उनकी चुत के अंदर तक जा रहा था। आंटी की चुत बहुत टाइट थी, जैसे किसी जवान लड़की की हो। हर धक्के के साथ उनकी चुत मेरे लंड को और कसकर पकड़ रही थी। मैंने उनके कूल्हों को पकड़ लिया और ज़ोर-ज़ोर से चोदने लगा। आंटी अब पूरी तरह से बहक चुकी थीं, उनके बाल बिस्तर पर बिखरे हुए थे, पसीने से उनका शरीर चमक रहा था। वो बार-बार कह रही थीं, |और… और… मुझे चोदो…|

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कुछ देर बाद मैंने अपना लंड बाहर निकाला और आंटी को पलट कर उनकी पीठ के बल लिटा दिया। आंटी ने खुद अपनी कमर उठाई और मैंने पीछे से उनकी चुत में अपना लंड डाल दिया। इस पोज़ में उनकी चुत और भी गहरी लग रही थी। मैंने उनके कूल्हों को पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से झटके देने शुरू कर दिए। आंटी के मुँह से चीखें निकलने लगीं, |आआह्ह्ह… हाँ… ऐसे ही…| मेरा लंड उनकी चुत के अंदर रगड़ खा रहा था, और हर बार जब मैं पीछे से ज़ोर से घुसता, आंटी का शरीर आगे की ओर धकेला जाता। उनका चेहरा बिस्तर में दबा हुआ था और उनकी कराहें धीमी हो गई थीं। मैंने उनके बालों को पकड़कर हल्का सा खींचा और चोदना जारी रखा।


फिर मैंने उन्हें उठाकर बैठाया और अपनी गोद में ले लिया। अब आंटी मेरे ऊपर थीं। उन्होंने खुद अपनी चुत में मेरा लंड डाला और ऊपर-नीचे होने लगीं। मैंने उनके स्तनों को पकड़कर दबाया और उन्हें चूसा। आंटी की चुदाई अब और भी तेज़ हो गई थी। वो खुद अपनी चुत को मेरे लंड पर रगड़ रही थीं। उनकी आँखें बंद थीं, मुँह खुला था और होंठों से लगातार कराहें निकल रही थीं। मैंने अपने हाथ उनके कूल्हों पर रखकर उन्हें और तेज़ उछालना शुरू कर दिया। हर बार जब वो नीचे आतीं, मेरा लंड उनकी चुत के अंदर गहराई तक जाता। आंटी ज़ोर से चीख पड़तीं, |आआअह्ह्ह्हह… रुकना मत…|


हम दोनों का पसीना एक दूसरे से मिल रहा था, साँसें तेज़ थीं, शरीर गर्म थे। मुझे लग रहा था कि मैं अब ज़्यादा देर नहीं रुक पाऊँगा। मेरा लंड उनकी चुत के अंदर फटने को बेताब हो रहा था। मैंने आंटी को फिर से बिस्तर पर लिटा दिया, उनके पैर उठाकर उनकी चुत को पूरी तरह से खोल दिया। अब मैं उन्हें पूरी ताकत से चोदने लगा। हर धक्के के साथ मेरा शरीर उनके शरीर से टकरा रहा था। आंटी भी मेरे साथ अपनी कमर उठा-उठाकर मेरा साथ दे रही थीं। उनकी चुत अब और भी गीली हो चुकी थी, और मेरा लंड उसमें आसानी से अन्दर-बाहर हो रहा था।


अचानक आंटी का शरीर ऐंठने लगा, उन्होंने मुझे ज़ोर से पकड़ लिया और चीखीं, |अर्जुन… मैं… मैं… जा रही हूँ…| उनकी चुत मेरे लंड को और ज़ोर से दबाने लगी। मैं समझ गया कि वो झड़ने वाली हैं। मैंने अपनी गति और तेज़ कर दी और कुछ ही सेकंड में मैं भी अपने चरम पर पहुँच गया। मेरा लंड उनकी चुत के अंदर ही फट पड़ा और मेरा सारा पानी उनकी चुत में भर गया। आंटी के शरीर में भी उसी समय ऐंठन उठी और वो भी झड़ गईं। हम दोनों एक साथ कराह उठे, |आआअह्ह्ह्हह…| मेरा पूरा शरीर काँप रहा था, और आंटी का भी। मैं उनके ऊपर गिर गया और हम दोनों देर तक एक दूसरे से लिपटे हुए साँसें भरते रहे।


कुछ देर बाद जब हमारी साँसें सामान्य हुईं, आंटी ने मेरे बालों में हाथ फेरा और मुस्कुराते हुए बोलीं, |तुम तो बड़े शैतान निकले, अर्जुन।| मैंने शरमाते हुए कहा, |आपकी वजह से आंटी, आप इतनी सुंदर हो कि खुद को रोक नहीं पाया।| वो हल्का सा हँसीं और बोलीं, |चलो, अभी रात बाकी है।| यह सुनकर मुझे समझ आया कि यह तो सिर्फ शुरुआत थी। रात भर हमें और भी बहुत कुछ करना था।


हम दोनों उठे और नहाने चले गए। बाथरूम में भी हमारी हरकतें शुरू हो गईं। शावर के नीचे खड़े-खड़े आंटी ने मुझे पीछे से पकड़ा और मेरे लंड को फिर से पकड़ लिया। वो अब पूरी तरह से बेझिझक हो गई थीं। उन्होंने मुझे दीवार से सटाया और मेरे लंड को मुँह में लेकर चूसने लगीं। पानी की बौछार के बीच उनका मुँह मेरे लंड पर तेज़ी से चल रहा था। मैं दीवार का सहारा लेकर खड़ा रहा और सिर्फ आनंद लेता रहा। फिर मैंने उन्हें दीवार की ओर घुमाया, उनकी कमर झुकाई और पीछे से उनकी चुत में अपना लंड डाल दिया। गीले शरीर पर मेरे हाथों की पकड़ और भी मज़बूत थी। पानी की आवाज़ के साथ हमारी चुदाई की आवाज़ भी गूँज रही थी।


बाथरूम से निकलकर हम वापस बिस्तर पर आ गए। इस बार आंटी ने खुद मेरे ऊपर बैठकर मेरा लंड अपनी चुत में डाला और धीरे-धीरे झूलने लगीं। उनके स्तन मेरी आँखों के सामने हिल रहे थे, और मैं उन्हें दबा रहा था। आंटी की साँसें फिर से तेज़ हो गईं। वो अपनी आँखें बंद करके सिर्फ मुझ पर झूल रही थीं। मैंने उनके कूल्हों को पकड़कर उन्हें और तेज़ उछाला। हर बार जब वो नीचे गिरतीं, मेरा लंड उनकी चुत के अन्दर तक घुस जाता। आंटी के मुँह से फिर से वही मीठी कराहें निकलने लगीं, |उह्ह्ह्ह… अर्जुन… तुम बहुत अच्छा चोदते हो…| उनकी यह बात सुनकर मेरा आत्मविश्वास और बढ़ गया।


पूरी रात हमने कई पोज़ में चुदाई की। कभी आंटी मेरे नीचे होतीं, कभी ऊपर, कभी पीछे से, कभी सामने से। हर बार जब मैं उनकी चुत में अपना लंड डालता, वो पहले से ज़्यादा गर्म और गीली लगती। मैंने उन्हें कभी इतना ज़ोर से चोदा कि बिस्तर की चादर ही खिसक गई। आंटी भी पूरी तरह से पागल हो गई थीं। वो खुद कहतीं, |मुझे और चोदो, और तेज़ चोदो, मुझे रात भर चोदते रहो।| उनकी बातें सुनकर मेरा लंड फिर से खड़ा हो जाता था, और हम फिर से शुरू हो जाते थे।


एक बार तो मैंने उन्हें बिस्तर से उठाकर खड़े-खड़े ही चोदना शुरू कर दिया। उनकी एक टाँग मेरी कमर से लिपटी थी और दूसरी ज़मीन पर थी। मेरा लंड उनकी चुत में गहराई तक जा रहा था, और हर झटके के साथ आंटी की साँसें फूल रही थीं। यह पोज़ बहुत देर तक नहीं चला, क्योंकि हम दोनों थक गए और बिस्तर पर गिर पड़े। फिर भी हमने चुदाई जारी रखी। मैं उनकी चुत को अपने मुँह से चाटता, वो मेरे लंड को चूसती, और फिर हम एक दूसरे में खो जाते।

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रात के तीन बजे तक हम लगातार एक दूसरे का आनंद लेते रहे। आंटी ने मुझे बताया कि उनके पति कभी उन्हें इस तरह संतुष्ट नहीं कर पाए, और यही वजह थी कि उनकी अन्तर्वासना उन्हें मेरी ओर खींचती थी। उन्होंने कहा, |मैं तुम्हें देखकर हमेशा से ही कुछ और सोचती थी, अर्जुन।| मैंने कहा, |मैं भी आपके बारे में सोचकर कई रातें बिना सोए गुज़ार देता था।| हमारी बातें और हमारी चुदाई पूरी रात चलती रही।


सुबह जब हम उठे, तो शरीर में हल्की थकान थी, लेकिन आँखों में एक अलग सी चमक थी। आंटी ने मुझे चाय बनाकर दी और बोलीं, |ये रात मैं कभी नहीं भूलूँगी।| मैंने मुस्कुराकर कहा, |मैं भी नहीं आंटी।| फिर जैसे ही मैंने उन्हें गले लगाया, हमारी अन्तर्वासना फिर से जाग उठी। सुबह की हल्की धूप में भी हमने एक आखिरी बार चुदाई की। यह बार धीरे-धीरे, प्यार से, एक दूसरे को महसूस करते हुए। आंटी के चेहरे पर संतोष था, और मेरे दिल में एक अजीब सी खुशी।


जब मैं उनके घर से निकला, तो राहुल का फोन आया। उसने पूछा, |कैसा रहा? माँ को कोई दिक्कत तो नहीं हुई?| मैंने मन ही मन मुस्कुराते हुए कहा, |नहीं यार, सब अच्छा रहा।| लेकिन मैं जानता था कि यह सच मैं कभी किसी को नहीं बता सकता।

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