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ननदोई ने फिर से कुवारेपन का एहसास करवाया - Hindi Sex Stories

  • Kamvasna
  • 10 जन॰
  • 7 मिनट पठन

मैं अनामिका आपको अपनी रंगीन कहानी सुना रही हूँ। ये मेरी पहली कहानी है।


मैं मेरठ की रहने वाली हूँ। जब मैं जवान हुई तो घरवालों ने मेरी शादी उन्नाव में एक अच्छे घर में कर दी। मेरे पति पंकज बहुत अच्छे आदमी थे। शादी के बाद मेरे दिन बहुत खुशी से गुजरने लगे।


ससुराल में मेरी दो ननदें थीं। छोटी वाली का नाम विनीता था और बड़ी ननद का नाम पल्लवी था। मेरी सास बहुत अच्छी थीं, कभी मुझसे झगड़ा नहीं करती थीं। ससुर जी भी बड़े नेक इंसान थे। इस तरह ससुराल में मेरा मन पूरी तरह लग गया।


शादी के शुरुआती दिनों में जब मैं ससुराल आई थी तो बहुत डर रही थी। सोचती थी कि कहीं परिवारवाले बुरे न निकलें, कहीं मुझे गालियाँ न पड़ें। हर रोज अखबार में पढ़ती थी कि किसी दुल्हन को जला दिया, किसी को फाँसी पर लटका दिया। इसलिए दिल में खूब डर था।


लेकिन ससुराल आकर पता चला कि मैं बेवजह डर रही थी। ये लोग तो बड़े सीधे-सादे और सरल स्वभाव के थे, बिल्कुल मेरे मायके जैसे। शादी के नौ महीने बाद मुझे बेटा हुआ तो बड़ी ननद पल्लवी भी आईं। उनके पति सूरज भी आए। बेटे की बरही में बड़ा आयोजन हुआ, पूरा परिवार इकट्ठा हुआ, सभी ननद-ननदोई आए।


मेरे ननदोई सूरज बहुत शर्मीले थे। आप तो जानते ही हैं कि भाभी और ननदोई का रिश्ता कितना प्यारा और मजाक भरा होता है। उस दिन पहली बार मैंने उन्हें ध्यान से देखा। बरही वाले दिन सूरज आए और एक कुर्सी पर चुपचाप बैठ गए, खासकर भाभियों से बहुत शरमाते थे।


सूरज गोरखपुर में पशु चिकित्सक थे। मैंने उन्हें देखा तो दौड़कर उनके लिए कोल्ड ड्रिंक और स्नैक्स ले गई। सूरज ने मुझसे नजर नहीं मिलाई, हल्का सा मुस्कुराए और कोल्ड ड्रिंक ले ली। मैंने कामुक अंदाज में कहा, अरे ननदोई साहब, जरा इधर भी नजर डालिए, अपनी सलहज से नहीं मिलेंगे। वो मेरी ओर पलटे, हल्का मुस्कुराए।


अरे, आप तो लड़कियों जैसी शर्म खाते हैं, मैंने हँसते हुए कहा। अब सूरज मेरी ओर देखने लगे। बड़ी मुश्किल से मैंने उनकी शर्म दूर की। सूरज बहुत स्मार्ट थे, बिल्कुल सलमान खान जैसे लगते थे। डॉक्टर थे लेकिन जरा भी घमंड नहीं। अपने दम पर नौकरी पाई थी, पढ़ाई में होशियार थे, पशु चिकित्सा का कोर्स किया था।


अब गोरखपुर के सरकारी पशु अस्पताल में डॉक्टर थे। अपने दम पर सुंदर बंगला बना लिया था। पल्लवी अब बंगले वाली हो गई थी। मेरे पति लेखपाल थे, हमारा भी बंगला बन गया था। लेकिन पल्लवी की शादी में पंकज को दस लाख खर्च करने पड़े थे। अब छोटी ननद विनीता की पढ़ाई में भी पंकज ही पैसा लगा रहे थे। ससुर जी छोटे-मोटे वकील थे, बस गुजारा भर कमाते थे। पैसों को लेकर पंकज से झगड़ा भी हुआ था कि वो ननदों पर अपना पैसा क्यों लुटाते हैं।


सूरज अब मुझसे खुल गए थे, खूब बातें करने लगे। उन्हें फिल्मों का बहुत शौक था। मुझे बताते थे कि क्या-क्या खाना पसंद है, कभी मूड होता तो खुद हाथ से बढ़िया पकवान बना लेते। बातों-बातों में मैंने उनका व्हाट्सएप नंबर ले लिया। मैं उन्हें सुबह-शाम गुलाब का फूल भेज देती। धीरे-धीरे वो भी मुझे हँसी-मजाक के चुटकुले भेजने लगे।


एक दिन मैं बड़ी मस्ती के मूड में थी। बताइए ननदोई जी, आप मेरी ननद को कैसे लेते हैं, संतुष्ट कर पाते हैं, मैंने व्हाट्सएप पर लिख भेजा। काफी देर तक जवाब नहीं आया। सोचा शायद बुरा मान गए या शर्माने लगे। लेकिन थोड़ी देर बाद एक फोटो आई, जिसमें चुदाई के छह आसनों की तस्वीरें थीं। मैं तो शर्मा गई।


कोई आसन नहीं छोड़ता, सब बारी-बारी से करता हूँ, उन्होंने लिखा। मैं तो हक्की-बक्की रह गई। बाहर से लगते थे दुनिया के सबसे शरीफ, लेकिन अंदर से पूरा वात्स्यायन। चुदाई की बातें इतने खुले ढंग से करते थे, अद्भुत।


सलहज और ननदोई का ये हँसी-मजाक उस दिन से चल पड़ा। ननदोई को सेक्सी किताबें पढ़ने का बहुत शौक था, जबकि पल्लवी तो इस मामले में बिल्कुल ठंडी थीं, साहित्य में कोई रुचि नहीं। मुझे भी चुदाई वाली नॉवेल्स पढ़ने में मजा आता था।


अब जब ननदोई कोई सेक्सी नॉवेल ऑनलाइन खरीदते तो मेरे लिए भी एक कॉपी ले लेते। किताब डाक से मेरे पते पर आ जाती। इस तरह हमारी दोस्ती दिन पर दिन गहरी होती गई।


कुछ महीनों बाद पल्लवी को बच्चा होने वाला था। उसी समय छोटी ननद विनीता को भी बच्चा होने वाला था, इसलिए मुझे पल्लवी की सेवा के लिए उनके घर भेज दिया गया। मैं दिन-रात उनकी देखभाल करती। जब डिलीवरी का समय आया तो पल्लवी को अस्पताल में भर्ती कराया गया। मैं हमेशा उनके पास रहती।


रात में सूरज नौकरी से लौटते और पल्लवी का हाल लेते। एक शाम मैं पल्लवी के पास बैठी थी कि सूरज आ गए। सलहज जी, चलिए कैंटीन में कुछ खा-पी लें, उन्होंने कहा। मैं उनके साथ हो ली। कैंटीन में उस समय कोई नहीं था। सूरज ने चाय और समोसे ऑर्डर किए। हम बातें करने लगे। सूरज मुझे अजीब नजरों से देख रहे थे।


ननदोई जी, आप मुझे ऐसे क्यों देख रहे हैं, मैंने हँसकर पूछा।


सलहज जी, पता नहीं क्यों, बार-बार लगता है कि मेरी शादी आपसे या आप जैसी लड़की से होनी चाहिए थी। हम दोनों में कितनी समानताएँ हैं, साहित्य समझते हैं, किताबें पढ़ने के शौकीन हैं। पल्लवी तो बिल्कुल बोरिंग हैं, कभी कोई टॉपिक डिस्कस नहीं करतीं, सूरज ने कहा।


पता नहीं क्या हुआ, मुझे भी वैसा ही लगा। हम अंधेरे कोने में कुर्सियों पर बैठे थे। सूरज ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। मैंने नहीं हटाया। वो टेबल के नीचे मेरे पैर से पैर मिलाने लगे। मैं चुप रही। उनकी हरकतें बढ़ती गईं। कैंटीन वाला अभी चाय नहीं लाया था। मौका देखकर सूरज ने मेरे होंठों पर किस ले लिया।


अब मैं साफ कहती हूँ, मैं अपने ननदोई सूरज से चुदवाना चाहती थी। अंधेरे में जब तक समोसे आए, सूरज मेरे होंठ पाँच-छह बार चूम चुके थे। मैं भी पूरी तरह गर्म हो चुकी थी।


दोगी, सूरज ने बिना संकोच के पूछा। मैं तो शर्मा कर गल गई।


पर कहाँ, मैंने नजरें उठाकर पूछा। सूरज मेरी आँखों में आँखें डालकर देखने लगे। मैं भी उन्हें ताड़ रही थी।


यहीं रुको, मैं एक सेकंड में आता हूँ, वो बोले। वो कैंटीन वाले के पास गए, कुछ कान में कहा। उसने बताया कि उसका स्टोर रूम खाली है, वहाँ आराम से हो जाएगा। सूरज ने उसके हाथ में सौ का नोट रखा। कैंटीन वाले ने स्टोर रूम की चाबी दे दी।


मैं सूरज के साथ स्टोर रूम में चली गई। वहाँ सब्जियाँ रखी थीं। हम अंदर गए, सूरज ने दरवाजा बंद कर लिया। वो मेरे बदन पर टूट पड़े। सलहज जी, यकीन नहीं करेंगी, आपकी शादी में पहली बार देखा था तब से दिल कहता था आपको चोद लूँ। आपको पाने के लिए कितना बेचैन था, ये आप नहीं जानतीं, सूरज बोले।


मैं कुछ नहीं बोली, बस हल्का मुस्कुरा दी। उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया। मेरे होंठों का रस पीने लगे, आह्ह, उनकी गर्म साँसें मेरे बदन में समा रही थीं। मैंने खुद को पूरी तरह उनके हवाले कर दिया। रोज-रोज पंकज का पुराना लंड खाकर मैं थक चुकी थी, जीवन में नयापन खत्म हो गया था।


अब सूरज के साथ फिर से कुंवारी जैसा अहसास हो रहा था। सूरज ने झटका देकर मुझे अपनी ओर खींचा, मैं उनसे बिल्कुल चिपक गई। उनके हाथ मेरी छातियों पर दौड़ने लगे। नए मर्द का स्पर्श पाकर बदन में सिहरन दौड़ गई।


सूरज मेरे होंठ चूस रहे थे, उनकी भीनी महक मेरी रूह में उतर रही थी। हम दोनों स्टोर रूम में पड़े पुराने गद्दे पर पहुँच गए, वो समोसेवाला रात में वहीं सोता था। सूरज मुझे वहाँ खींच ले गए। हम लेटकर रोमांस करने लगे। मैं भी उन्हें चूमने-चाटने लगी।


सूरज पर वासना इस कदर सवार थी कि वो मुझे हर जगह चूम रहे थे। मेरी लाल कुर्ती उन्होंने उतार दी। मैंने सफेद कॉटन ब्रा पहनी थी। सूरज ने मुझे सीने से लगाया। सलहज जी, आपके जैसी हसीन औरत आज तक नहीं देखी, हमेशा मेरे टच में रहिएगा, वो बोले।


मेरे काले लंबे बाल एक ओर किए, मेरी नंगी पीठ को चूमने-चाटने लगे। मेरी पीठ की मनभावन खुशबू उनके बदन में समा गई। सूरज पागल से हो गए। सलहज जी, आज मुझे अपने रूप का सारा रस पिलाइए, वो फुसफुसाए। मैं मुस्कुरा दी।


उन्होंने पीठ पर कई किस किए फिर ब्रा के हुक खोल दिए। मैं शर्मा गई। ब्रा एक ओर रखी। मुझे घुमाया और सीधे मेरे स्तन मुँह में ले लिए। आह इह्ह, मेरे मुँह से सिसकारी निकली। अब तक सिर्फ पंकज ही मेरे स्तन पीते थे, आज दूसरा मर्द मेरे दूध का रस पी रहा था।


सूरज ने मुझे गद्दे पर पूरी तरह लिटा दिया, खुद ऊपर आ गए। बारी-बारी दोनों स्तन चूसने लगे, ओह्ह आह्ह, मेरी चूत गीली हो चुकी थी। एक बच्चे के बाद भी मेरे स्तन कसे और सुडौल थे। सूरज ललचाई नजरों से पी रहे थे। मुझे स्वर्ग सा मजा मिल रहा था।


फिर सूरज ने मेरी सलवार खोलकर उतार दी। सफेद कॉटन पैंटी भी निकाल दी। मैं ज्यादातर कॉटन पैंटी ही पहनती थी क्योंकि गर्मी में पसीना आता था, वो आराम देती थी। अब सूरज मेरी बुर चाटने लगे। मेरी बुर मस्त और गुदगुदी थी, हल्की झाँटें थीं।


सूरज मजे से चाट रहे थे, ग्ग्ग्ग गी गी गों गों, उनकी जीभ अंदर तक घुस रही थी। आह ह ह ह्हीईई आअह्ह्ह, मैं तड़प उठी। एक बच्चे के बाद भी मेरी बुर तंग और साफ-सुथरी थी। सूरज खूब देर तक चाटते रहे, मेरी चूत से रस टपक रहा था।


फिर उन्होंने अपना मोटा लंड बाहर निकाला और मेरी चूत में घुसेड़ दिया। बिल्कुल फिट बैठ गया। मैंने दोनों पैर हवा में उठा लिए। सूरज मेरे ऊपर लेटकर धीरे-धीरे पेलने लगे। मैंने आँखें बंद कर लीं क्योंकि ये नाजायज रिश्ता था।


सलहज जी, आँखें खोलो, आँखें खोलो, वो बार-बार कहते रहे लेकिन मैंने चुदाई के दौरान नजर नहीं मिलाई। वरना प्यार हो जाता और शायद मैं हमेशा उनके साथ रह जाती। सूरज पटा-पट पेल रहे थे, कमर मटकाकर जोर-जोर से धक्के मार रहे थे।


वो मुझे चोदते-चोदते मेरे दूध भी पी रहे थे, होंठ भी चूस रहे थे। आह्ह ओह्ह ऊउइ ऊईईई, मैं सिसकारियाँ ले रही थी। उनका मोटा लंड मेरी चूत को भर रहा था। कुछ देर बाद सूरज पसीने से तरबतर होकर मेरी चूत में ही झड़ गए।


उनके बाद हम दोनों नंगे ही एक-दूसरे से लिपटे रहे। सलहज जी, अब ये सिलसिला मत रोकना, सूरज बोले। मैंने साफ जवाब नहीं दिया, बस हल्का मुस्कुरा दी। फिर कपड़े पहने और नीचे आ गए।


दो दिन बाद पल्लवी को बेटी हुई। तब से मैं नौ-दस बार चुपके से अपने ननदोई से चुदवा चुकी हूँ। हर बार वो मुझे फिर से कुंवारी सा अहसास कराते हैं।


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