पड़ोसन भाभी का गांड मरवाने का सीक्रेट शौक : Free Sex Kahani
- Kamvasna
- 10 hours ago
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ये हिंदी सेक्स कहानी लिखने से पहले मैं एक बात साफ कर दूं कि ये मेरी ज़िंदगी का वो किस्सा है जिसे मैं हमेशा अपने सीने में दबाए रहा, एक ऐसा राज़ जो कभी किसी को बताने की हिम्मत नहीं हुई। पड़ोसन भाभी के साथ जो हुआ, वो महज़ एक संयोग था या किस्मत का खेल, ये आज तक मैं नहीं समझ पाया। लेकिन जो भी हुआ, उसने मेरी रूह को ऐसे झकझोर दिया कि सालों बाद भी उसकी गूंज मेरे बदन में कौंध जाती है। बात करीब पांच साल पुरानी है, जब मैं लखनऊ के एक पुराने मोहल्ले में किराए पर रहता था। मोहल्ला वैसे तो शरीफों का था, लेकिन गलियों में छुपी गर्माहट का अपना ही आलम था। मेरे बगल वाले घर में एक नया जोड़ा रहने आया था—विक्रम भैया और उनकी बीवी, नेहा भाभी। विक्रम भैया एक प्राइवेट कंपनी में सेल्स मैनेजर थे, अक्सर टूर पर रहते, कभी दिल्ली तो कभी मुंबई। और नेहा भाभी, वो अकेली घर पर। उम्र होगी उनकी कोई 32 साल, लेकिन जवानी जैसे पूरे शबाब पर थी। रंग गोरा, बाल घने और लहराते हुए, और आंखें ऐसी गहरी कि डूब जाने का दिल करे। पहली ही नज़र में समझ आ गया था कि ये औरत मोहल्ले की आबोहवा बदलने वाली है।
मैं उन दिनों 25 साल का था, एक निजी कंपनी में जॉब करता, और शाम को घर लौटता तो अक्सर नेहा भाभी से आँखें चार हो जातीं। वो अपने बरामदे में बैठी चाय पीतीं या कुछ पढ़तीं, और मेरे गुज़रने पर एक हल्की सी मुस्कान देतीं। शुरू में तो बस इतनी ही बात थी, लेकिन धीरे-धीरे बातचीत का सिलसिला बढ़ने लगा। एक शाम मैं अपने घर के बाहर बाइक धो रहा था, तभी नेहा भाभी ने पुकारा, |सुनिए, ज़रा एक मिनट|। मैंने नज़र उठाई तो देखा वो अपने गेट पर खड़ी हैं, हल्की गुलाबी सूती साड़ी में लिपटी, बिना पल्लू के, ब्लाउज़ की सिलाई जैसे उनके उभारों को बाँध नहीं पा रही थी। मैंने हाथ का कपड़ा रखा और पास गया। |जी भाभी, बोलिए|। वो हल्की सी झिझक के साथ बोलीं, |मेरे किचन का नल लीक कर रहा है, आप ज़रा देख देंगे क्या?| मैं हामी भर के अंदर गया। उनके घर का अंदरूनी हिस्सा सादा लेकिन सुव्यवस्थित था, दीवारों पर कुछ पेंटिंग्स, कोने में एक बड़ा सा एक्वेरियम, और हवा में अगरबत्ती की हल्की खुशबू। मैं किचन में नल ठीक करने लगा, तो वो पास ही खड़ी रहीं, हाथ में एक गिलास पानी लिए। हमारी बातें होने लगीं, पहले विक्रम भैया के बारे में, फिर मेरी नौकरी के बारे में, फिर ज़िंदगी की उलझनों पर। वो बहुत सहजता से बोलती थीं, जैसे हम बरसों से एक दूसरे को जानते हों। उनकी हिंदी में एक ठेठ देसी मिठास थी, जो सीधे दिल में उतरती।
कुछ दिनों बाद एक रविवार को मैं घर पर ही था, बोर हो रहा था। दरवाज़े पर दस्तक हुई, खोला तो नेहा भाभी थीं। आज वो सफेद कुर्ती और लैगिंग्स में थीं, बिना दुपट्टे के, उनके उभार मानो कपड़ों की सरहदें तोड़ना चाहते थे। |अंदर आइए| मैंने कहा। वो आईं और बोलीं, |विक्रम जी का फोन आया था, उन्होंने कहा है कि इस बार उनका टूर बढ़ गया है, एक हफ्ता और लगेगा। मैं सोचा आपसे बात कर लूं, अकेले बोर हो रही थी|। मेरे सीने में एक अजीब सी खलबली मची। हम दोनों ड्राइंग रूम में बैठे, चाय बनी और बातों का दौर चला। उन्होंने अपनी शादी के किस्से सुनाए, कैसे वो विक्रम भैया से लव मैरिज करके आई थीं, लेकिन अब उनकी नौकरी की वजह से अक्सर तन्हा रहती थीं। मैंने उनकी बातें सुनीं और समझा कि इस औरत के अंदर एक ऐसी प्यास है, जो सिर्फ पानी से नहीं बुझने वाली। उस दिन हम घंटों बैठे रहे, उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी, और बातों-बातों में वो मेरे बहुत करीब आ जाती थीं, मगर फिर खुद ही संभल कर दूर हो जाती थीं।
एक दिन दोपहर की बात है, मैं छुट्टी पर था और अपने घर में कुछ किताबें पलट रहा था। अचानक बारिश शुरू हो गई, ऐसी ज़ोरदार कि बिजली भी चली गई। मैं खिड़की से झाँक ही रहा था कि नेहा भाभी की आवाज़ सुनाई दी, |अरे, आप तो घर पर हैं, मेरे यहाँ तो अँधेरा हो गया, मोमबत्ती नहीं है, ज़रा अपनी दे देंगे?| मैंने मोमबत्ती और माचिस ली और उनके घर पहुंचा। बारिश की वजह से उनका आँगन भीग रहा था, और वो खुद भी थोड़ी भीगी हुई थीं। सफ़ेद कुर्ती जो अब पानी से चिपक कर उनके जिस्म का हर नक्श बयां कर रही थी। अँधेरे कमरे में मोमबत्ती जलाने के बाद जो रौशनी फैली, वो किसी जादू से कम नहीं थी। हम दोनों फर्श पर बैठ गए, बारिश की आवाज़ और बिजली की चमक के बीच माहौल में एक सिहरन थी। तभी एक ज़ोरदार बादल गरजा, और वो सहम कर मेरे करीब सरक आईं। |मुझे बादलों की गरज़ से बहुत डर लगता है| उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। मेरा हाथ अनायास ही उनके कंधे पर चला गया। वो पल भर चौंकीं, फिर जैसे पिघल कर मेरी बाँहों में ढल गईं।
उस स्पर्श ने जो आग लगाई, वो अब धीरे-धीरे शोला बनने लगी थी। मेरी उंगलियाँ उनके कंधे को सहला रही थीं, और वो अपनी आँखें बंद किए हुए, मेरी छाती से सिर लगाए बैठी थीं। उनकी साँसों की गर्माहट मेरे कुर्ते के कपड़े को चीरती हुई सीधे मेरी त्वचा पर पड़ रही थी। मैंने धीरे से उनकी ठुड्डी को ऊपर उठाया और उनकी आँखों में झाँका। उन आँखों में अब कोई शिकन नहीं थी, बस एक गहरी, बेताब प्यास थी। |पता है, जब से तुम इस मोहल्ले में आई हो, मैं तुम्हें बस देखता ही रहता हूँ| मैंने धीमे स्वर में कहा। वो हल्की सी मुस्काईं और बोलीं, |मैंने भी तुम्हें देखा है, पर क्या करती, शादीशुदा हूँ|। इतना सुनते ही मानो बाँध टूट गया। मैंने उनके माथे पर हल्का सा चुम्बन लिया, और वो सिहर उठीं। फिर मेरे होंठ धीरे-धीरे उनकी आँखों, गालों और आखिरकार उनके होंठों पर आ रुके। होंठों का वो मिलन पहले तो बस एक हल्की सी छुअन था, लेकिन फिर वो गहराता चला गया। उनके होंठ नर्म और गर्म थे, और उन्होंने मेरे चुम्बन का ऐसे जवाब दिया जैसे वो बरसों से इसी पल का इंतज़ार कर रही हों।
मेरा हाथ धीरे-धीरे उनकी पीठ पर घूमने लगा, कुर्ती के पतले कपड़े के ऊपर से ही मुझे उनकी पीठ की चिकनाहट महसूस हो रही थी। वो हल्की-हल्की कराह रही थीं, आआह्ह्ह… उनका एक हाथ अब मेरे बालों में था और दूसरा मेरी पीठ को कस कर पकड़े हुए था। मेरा हाथ कुर्ती के नीचे से अंदर दाखिल हुआ, और सीधे उनकी नंगी पीठ को छुआ। उसकी चिकनाहट और गर्माहट ने मेरी रीढ़ में बिजली सी दौड़ा दी। मैंने धीरे-धीरे उनकी कुर्ती को ऊपर की तरफ सरकाना शुरू किया, और वो बिना किसी रोक-टोक के अपने हाथ ऊपर करके मेरी मदद कर रही थीं। देखते ही देखते कुर्ती उनके जिस्म से अलग होकर फर्श पर गिर चुकी थी। अब सिर्फ उनकी ब्रा थी, जो गहरे गुलाबी रंग की थी और उनके गोरे बदन पर बहुत ही कामुक लग रही थी। मैंने अपने होंठ उनकी गर्दन पर रख दिए, और वो ज़ोर से काँप उठीं।
मैं उनकी गर्दन को चूमते हुए नीचे उनके कंधों तक आया, फिर हंसुली की हड्डी तक। मेरे हाथ उनकी पीठ पर ब्रा के हुक ढूँढ रहे थे। एक झटके में हुक खुल गया और ब्रा ढीली पड़ गई। मैंने धीरे से उसे हटाया, और उनके स्तन मेरी आँखों के सामने थे—दो नर्म, गोल-मटोल पहाड़, जिनकी चोटियाँ भूरे गुलाबी रंग की थीं और उत्तेजना से सख़्त हो चुकी थीं। मैंने अपना मुँह एक चोटी पर रखा और चूसने लगा। नेहा भाभी ने एक गहरी सिसकारी भरी, |उह्ह्ह्ह्ह… धीरे साहिल…| उनकी उंगलियाँ मेरे बालों को मरोड़ रही थीं। मैं बारी-बारी से दोनों स्तनों को चूमता, चाटता और हल्की-हल्की दाँतों से काटता रहा। हर स्पर्श पर वो तड़प उठतीं, उनकी कमर फर्श से ऊपर उठने लगती। मेरा हाथ धीरे-धीरे नीचे की तरफ सरक रहा था, उनकी नाभि को पार करता हुआ, पेट के निचले हिस्से पर ठिठकता हुआ। फिर मेरी उंगलियाँ उनकी लैगिंग्स के कमरबंद में फंस गईं।
मैंने ऊपर देखा, नेहा भाभी की आँखें बंद थीं, होंठों के बीच से हल्की-हल्की साँसें निकल रही थीं। उनके चेहरे पर एक गहरी समर्पण की लकीर थी। मैंने धीरे से लैगिंग्स और उसके नीचे पहनी पैंटी को एक साथ नीचे की ओर खिसकाया। उन्होंने अपनी कमर थोड़ी ऊपर उठाई, जिससे कपड़े आसानी से निकल गए। अब वो पूरी तरह से नग्न थीं, सिर्फ मोमबत्ती की हिलती-डुलती रौशनी में उनके जिस्म की नमी झिलमिला रही थी। उनकी जाँघें आपस में कसी हुई थीं, मानो कोई राज़ छुपा रही हों। मैंने उनके घुटनों पर हाथ रखा और धीरे-धीरे उनकी टाँगों को अलग किया। नेहा भाभी ने थोड़ा विरोध जताया, लेकिन मेरे हल्के दबाव के सामने उनकी जाँघें खुलती गईं। और तब मैंने देखा उनकी सबसे पोशीदा जगह—उनकी चुत। वहाँ के बाल एक सलीके से कटे हुए थे, और भीतर का गुलाबी गूदा रस से चमक रहा था। उसकी खुशबू, एक नमकीन और मदहोश कर देने वाली सोंधी महक, मेरे दिमाग को घुमा रही थी।
मैंने अपना सिर झुकाया और अपनी जीभ वहाँ के उभरे हुए मांसल हिस्से पर फिरा दी। नेहा भाभी ने ज़ोर से कसमसाते हुए अपनी कमर ऊपर की तरफ उछाली। |आआअह्ह्ह्हह… ये क्या कर रहे हो…| उनकी आवाज़ बुरी तरह काँप रही थी। मैं उसी हिस्से को अपने होठों में भर कर चूसने लगा, और मेरी जीभ बार-बार उस पर चक्कर लगा रही थी। उनके रस का स्वाद हल्का नमकीन, हल्का मीठा, एक ऐसा अमृत था जो मैं घूँट-घूँट करके पीना चाहता था। मेरी एक उंगली धीरे-धीरे उनके गीले द्वार पर घूम रही थी, और फिर धीरे से अंदर सरक गई। वो अंदर से इतनी गर्म और तंग थीं कि मेरी साँस रुक गई। मैंने धीरे-धीरे उंगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया, और साथ ही अपनी जीभ बाहरी हिस्से को पागलों की तरह चाट रही थी।
नेहा भाभी की कराहें अब लगातार बन रही थीं, उनकी टाँगें काँप रही थीं और वो मेरा सिर दबोचे हुए थीं। |हाँ… वहीं… उह्ह्ह्ह्ह… मत रोको… आआह्ह्ह्ह| मैंने अपनी उंगली की गति तेज़ कर दी, और दूसरी उंगली भी अंदर डाल दी। अब दो उंगलियाँ उस तंग सुरंग को फैला रही थीं, और मेरी जीभ उनकी चुत के हर कोने का स्वाद ले रही थी। कुछ ही मिनटों में उनके शरीर में एक ज़बरदस्त ऐंठन उठी, उनकी जाँघों ने मेरे सिर को जकड़ लिया, और वो ज़ोर से चीख पड़ीं, |आआअह्ह्ह्हह… निकल रहा है…| उनके भीतर से गर्म रस की एक लहर निकली, जिसे मैंने अपने मुँह में भर लिया। वो कुछ पल तक ऐसे ही तड़पती रहीं, फिर धीरे-धीरे ढीली पड़ गईं।
मैं ऊपर आया और उनके होंठों को चूमते हुए अपने कपड़े उतारने लगा। उन्होंने आँखें खोलीं और मुस्कुराईं, फिर उनका हाथ मेरी पेंट के ऊपर से ही मेरे तने हुए लंड पर आ रखा। उन्होंने उसे पकड़ा और दबाया, मानो उसकी सख़्ती का अंदाज़ा ले रही हों। मैंने तेज़ी से अपनी पैंट और अंडरवियर उतार फेंका। मेरा लौड़ा पूरी तरह से खड़ा था, उसकी नसें फूली हुई थीं और ऊपरी भाग चमकदार लाल हो रहा था। नेहा भाभी की नज़र उस पर पड़ी और वो होंठों ही होंठों में बुदबुदाईं, |बहुत बड़ा है|। मैंने उनकी जाँघों को और फैलाया और अपने लंड के ऊपरी हिस्से को उनकी गीली चुत के द्वार पर रगड़ने लगा। वो रगड़ इतनी प्यारी थी कि हर बार उनका शरीर थरथरा उठता। मैंने धीरे-धीरे अपने लण्ड का सिरा अंदर डाला। भीतर का गीलापन और तंगी ऐसी थी कि मुझे बाहर निकलने की धमक महसूस होने लगी, लेकिन मैंने खुद पर काबू रखा।
पहले धीरे-धीरे, एक इंच, फिर दो इंच, मेरा पूरा लण्ड उनके अंदर समाता गया। हर धक्के के साथ वो |उह्ह्ह्ह्ह| करतीं और अपनी आँखें कस कर बंद कर लेतीं। एक बार जब पूरा अंदर चला गया, तो मैंने उसे बाहर निकाला और फिर ज़ोर से अंदर धकेला। ये धक्का थोड़ा गहरा था, और नेहा भाभी ने मेरी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। |आह्ह्ह्ह… साहिल…| मैंने एक रिदम पकड़ ली—धीमी, गहरी, और लगातार चोदते हुए। हर बार जब मैं अंदर जाता, हमारी जाँघों की टक्कर से एक गीली, भद्दी आवाज़ निकलती, जो कमरे में गूँजती। मैं उन्हें मिशनरी पोज़ीशन में ही चोदे जा रहा था, उनकी टाँगें मेरी कमर पर लिपटी हुई थीं।
कुछ देर बाद मैंने अपनी गति तेज़ कर दी। अब मैं उन्हें ज़ोर-ज़ोर से चोदने लगा था, हर धक्का उनके पूरे जिस्म को झकझोर रहा था। नेहा भाभी की साँसें तेज़ हो गईं, और वो बोलीं, |मुझे ऊपर बैठने दो… मुझे तुम्हें चुदवाना है…| ये सुनकर मेरे लंड में एक और तनाव आ गया। मैंने उन्हें अपनी बाँहों में उठाया और खुद पीठ के बल लेट गया। नेहा भाभी मेरे ऊपर सवार हो गईं, उनके घने बाल बिखरे हुए थे और आँखों में एक शैतानी चमक थी। उन्होंने अपना हाथ नीचे ले जाकर मेरे लण्ड को पकड़ा और धीरे-धीरे अपनी चुत के द्वार पर सेट किया। फिर एक ही झटके में अपनी कमर नीचे करके मेरा पूरा लौड़ा अपने अंदर ले लिया। |आआअह्ह्ह्हह… उतना ही बड़ा है जितना दिखता है| वो ज़ोर से चिल्लाईं।
अब बारी थी उनके चुदवाने की। वो मेरे लण्ड पर ऐसे कूद रही थीं जैसे घोड़े पर सवार कोई शहज़ादी हो, उनके स्तन उछल-उछल कर मेरा ध्यान खींच रहे थे। मैंने उन दोनों स्तनों को अपने हाथों में जकड़ लिया और ज़ोर-ज़ोर से दबाने और मसलने लगा। वो ऊपर से अपनी चुत से मेरे लण्ड को बुरी तरह रगड़ रही थीं, उनकी गोलाई में हिलने का अंदाज़ ही कुछ और था। कभी वो आगे-पीछे होतीं, कभी गोल-गोल घूमतीं। उनकी चुदाई का ये अंदाज़ देखकर मैं हैरान था। ये औरत असल में एक चुदक्कड़ थी, जो अपनी भूख को बरसों से दबाए हुए थी, और आज वो बेलगाम होकर अपनी पूरी जवानी मुझ पर उड़ेल रही थी। मैं बीच-बीच में अपनी कमर ऊपर उठाकर उन्हें ज़ोरदार टक्कर मारता, जिससे वो और भी तड़पतीं।
कुछ देर तक ऐसे ही चुदवाने के बाद, वो थक कर मेरी छाती पर गिर पड़ीं, उनकी साँसें फूल रही थीं। लेकिन मुझे अभी और चोदना था। मैंने उन्हें अपने से अलग नहीं होने दिया, बल्कि उसी अवस्था में अपनी बाँहों से उनकी कमर कस ली और खड़ा हो गया। वो मेरे लण्ड पर ही लटकी हुई थीं, उनकी टाँगें मेरी कमर पर कसी हुई थीं। मैं उन्हें लेकर दीवार के पास गया और उनकी पीठ ठंडी दीवार से लगा दी। फिर मैंने अपनी कमर का पूरा ज़ोर लगाकर उन्हें चोदना शुरू कर दिया। ये खड़े होकर चोदने का पोज़ बहुत ही गहरा और कामुक था। हर बार मेरा लंड उनकी चुत की जड़ों तक जा रहा था, उनकी हर साँस के साथ एक दबी हुई सिसकी निकल रही थी। |अब तो बहुत हो गया… मैं गिर जाऊंगी…| वो बुदबुदाईं, लेकिन उन्होंने मुझे और कस लिया।
मैंने उन्हें वापस फर्श पर लिटाया, इस बार उनका पेट नीचे की तरफ। ये डॉगी स्टाइल पोज़ीशन का इशारा था। नेहा भाभी ने अपने घुटनों और हाथों के बल होकर अपनी गोल, उभरी हुई गांड को मेरी तरफ उठाया। उनकी गांड का नज़ारा किसी कलाकृति से कम नहीं था—दो मांसल, गोल-मटोल पहाड़ियाँ, जिनके बीच की लकीर नीचे उनकी रसीली चुत तक जाती थी। मैंने उस गांड पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा, और लाल निशान उभर आया। |आआह्ह्ह्ह… ये क्या…| उन्होंने चौंक कर पीछे देखा, लेकिन उनकी आँखों में शरारत थी। मैंने अपने लण्ड को पीछे से उनकी चुत में डाला और एक ही बार में पूरी ताकत से अंदर तक धकेल दिया। ये पोज़ मुझे बहुत पसंद था, क्योंकि इसमें मेरी जाँघें सीधे उनकी गांड से टकराती थीं, जिससे हर धक्के पर एक अश्लील सी चपत की आवाज़ आती थी।
मैंने उनकी कमर को अपने हाथों से मज़बूती से पकड़ा और जानवरों की तरह चोदने लगा। गति बहुत तेज़ थी, मेरे सिर का पसीना उनकी पीठ पर टपक रहा था। उनकी गांड पर मेरी जाँघों की लगातार चोट से वो और भी लाल हो रही थी। इसी दौरान मेरी नज़र उनके उस सबसे गुप्त छेद पर पड़ी, जो गांड की दरार में छुपा हुआ था। वो हल्के भूरे रंग का, सिकुड़ा हुआ, एकदम टाइट सा छेद। मैंने अपने अंगूठे को मुँह में गीला किया और धीरे-धीरे उस छेद पर रखा। नेहा भाभी का शरीर तन गया। |नहीं… वहाँ मत…| उन्होंने डरते हुए कहा। लेकिन मैंने उनके कान में फुसफुसाया, |भाभी, मुझे तो तुम्हारी गांड मरवानी है… मैंने सुना है तुम्हें गांड मरवाने का बहुत शौक है|। मेरी बात सुनकर उसके चेहरे पर एक शर्मीली लेकिन रोमांचित मुस्कान आ गई।
मैंने अपना लण्ड उनकी चुत से बाहर निकाला, जो उनके रस से पूरी तरह से चिकना हो चुका था, और उसके सिरे को उनकी गांड के छेद पर लगाया। पहले सिर्फ दबाव डाला, बिना घुसे। उनकी गांड का छेद जैसे मना कर रहा था, लेकिन मेरे लण्ड के चिकने सिरे ने धीरे-धीरे अपनी जगह बनानी शुरू की। नेहा भाभी ने अपने दाँत भींचे, उनकी उंगलियाँ फर्श को कुरेद रही थीं। |धीरे… बहुत धीरे… आआह्ह्ह्ह…| उन्होंने कराहते हुए कहा। मैंने धीरे-धीरे, एक-एक इंच करके अपना लंड उनकी गांड के अंदर डाला। वो चुत से भी कहीं ज़्यादा तंग थी, इतनी तंग कि मेरे लण्ड की हर नस उसकी दीवारों से रगड़ खा रही थी। जब मेरा पूरा लौड़ा अंदर चला गया, तो दोनों एक पल के लिए रुक गए, उस अजीबोगरीब लेकिन ज़बरदस्त कामुक भराव को महसूस करते हुए।
फिर मैंने हिलना शुरू किया। पहले सिर्फ हल्के-हल्के धक्के, ताकि उनकी गांड मेरे लौड़े की मोटाई की आदत डाल ले। कुछ ही सेकंड में उनकी कराहें बदल गईं। दर्द का वो स्वर गायब होकर मज़े की गहरी सिसकारियों में बदलने लगा। |अब ठीक लग रहा है… और तेज़ करो… आआअह्ह्ह्हह… मेरी गांड मारो…| उसके ये शब्द सुनकर मेरे अंदर का जानवर जाग उठा। मैंने उनकी कमर और कस कर पकड़ी और पीछे से उनकी गांड को ज़ोर-ज़ोर से चोदना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ उनकी गांड की मांसपेशियाँ मेरे लण्ड को जकड़ रही थीं, एक ऐसी पकड़ जो चुत से बिलकुल अलग और नशीली थी। मैं उनकी गांड में अपना लंड ताबड़तोड़ चोदते हुए उनके बाल खींच रहा था, और वो पागलों की तरह चिल्ला रही थीं, |हाँ… हाँ… बस मारो मेरी गांड… चोदो मुझे…|
मैंने उनकी गांड को चोदते हुए अपना हाथ नीचे उनकी चुत पर ले जाकर उसकी चुत की गीली दरारों को सहलाना शुरू किया। ये दोहरा उत्तेजना उनके लिए बहुत ज़्यादा थी। वो बुरी तरह काँप रही थीं, उनकी टाँगें जवाब दे रही थीं, लेकिन वो रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। मैं उनकी गांड में अपनी पूरी रफ्तार से धक्के दे रहा था, और मेरा सारा वजूद बस एक ही धुन में जल रहा था—उनकी गहराई में अपना पूरा तनाव छोड़ देने की।
आखिरकार मेरी साँसें उखड़ गईं, मेरे पेट के निचले हिस्से में एक भयानक गर्म सिहरन उठी। |भाभी… अब मैं निकल रहा हूँ…| मैंने चीखते हुए कहा। |मेरी गांड के अंदर ही निकाल दो… अंदर ही…| उसने जवाब दिया और अपनी गांड को और पीछे की तरफ धकेल दिया। मेरे लण्ड ने एक आखिरी बार उनकी गुदा को अंदर तक चीरा, और फिर मेरे भीतर का ज्वालामुखी फूट पड़ा। मेरे लंड ने ज़ोरदार धक्कों के साथ अपना गर्म, गाढ़ा माल उनकी गांड के अंदर छोड़ना शुरू कर दिया। एक… दो… तीन… कितनी ही फुहारें थीं, जो लगातार उनकी आँतों में भरती जा रही थीं। हर फुहार के साथ मेरा लण्ड ज़ोर से फड़कता और मैं |आआअह्ह्ह्हह| करता हुआ अपनी पूरी जान उसके अंदर उँडेल रहा था। नेहा भाभी भी अपने चरम पर पहुँच गई थीं, उनकी चुत की मांसपेशियाँ बेतहाशा सिकुड़ रही थीं और उसमें से गर्म रस की बौछारें मेरे हाथ पर गिर रही थीं।
करीब एक मिनट तक हम ऐसे ही जड़वत पड़े रहे, मेरा ढीला पड़ता हुआ लंड अभी भी उनकी गांड में ही था। आखिरकार मैंने धीरे से बाहर निकाला, और मेरे माल की एक गर्म धार उनकी गांड के छेद से बाहर निकल कर उनकी जाँघों पर बहने लगी। वो बस ढह सी गईं, पूरी तरह से संतुष्ट, उनका शरीर पसीने से चमक रहा था। मैं भी उनके पास ही लेट गया, अपनी साँसों को सामान्य करने की कोशिश करते हुए। बारिश रुक चुकी थी, और बिजली वापस आ गई थी, लेकिन हम दोनों ने उस रौशनी की परवाह नहीं की। हम वहीं, उसी फर्श पर, एक-दूसरे से लिपटे रहे, जैसे हमारे जिस्म कभी अलग हुए ही न हों। वो रात जैसे मेरी रूह पर एक ऐसा निशान छोड़ गई, जो कभी मिटने वाला नहीं था। और नेहा भाभी, वो मेरी पड़ोसन भाभी, वो गांड मरवाने की शौकीन औरत, मेरी ज़िंदगी का सबसे गहरा, सबसे तूफानी राज़ बन गई।
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