भ्राता श्री का टी -२० मैच : Gay Sex Stories
- Dr. Kamesh
- Jul 12
- 7 min read
कामवासना के सभी विद्वान पाठकों को प्यार भरा नमस्कार। इस कहानी के नायक हमारे अग्रज भ्राता श्री अब सरकारी सेवा निव्रत्त होकर फ़ेसबुक, इन्स्टाग्राम पर जीवन की रंगरेलियाँ मनारहे हैं और अपनी प्रतिभा का निरंतर विकास करके दिन प्रतिदिन नौजवान होते जा रहे हैं। उनकी नवयुवकों को ट्रेनिंग देने में काफ़ी रुचि है और मज़मून भाँप लेते हैं लिफ़ाफ़ा देखकर। अंतर्वस्त्रों के अंदर के छिपे औजारों की नापतोल के लिए अपने अनुज यानि मुझे फोटो भेजते रहते हैं। ज़्यादातर मेरा अनुमान सटीक होता है, फिर प्रेक्टिकल के बाद वह उसे लिपिबद्ध करते हैं जिसे मैं वस्त्रविहीन हो पढ़ता और अपनी फ़ोटो के साथ पाठकों को साझा करता रहता हूँ। इसी कड़ी की नई कहानी भ्राता श्री के शब्दों में प्रस्तुत है।
उसका नाम आदित्य भट था। शहर के कोने में एक छोटे से किराए के मकान में रहता था — इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दूर-दराज के कस्बे से आया हुआ। पहली बार जब मैंने उसे देखा, तो लगा जैसे कोई कोमल मूर्ति हवा में चल रही हो। चिकनी, हल्की चमकती त्वचा, गोल-गोल गाल जिनमें बचपन की मासूमियत अभी भी बसी थी, और एक ऐसा भराव जो न तो मोटापा कहलाए, न दुबलापन — बस एक आमंत्रित करने वाली गरमाहट। छोटी-छोटी मूँछें, जो अभी पूरी तरह नहीं आई थीं, पर उसकी मुस्कान में एक शरारत भरी चमक थी।
आँखें गहरी, जैसे कुएँ में उतरने को तैयार।हमारे घर के ठीक बगल वाला कमरा उसका था। आते-जाते रास्ते में नजरें मिलतीं। कभी "नमस्ते अंकल" कहकर मुस्कुराता, कभी सिर झुकाकर शर्म से गुजर जाता। मैंने सोचा, यह लड़का कितना अलग है — शहर की भीड़ में भी अपनी एक निजी दुनिया लिए हुए। धीरे-धीरे परिचय हुआ। एक दिन मैंने रोककर बात की। उसकी आवाज में एक मधुर लय थी, जैसे कोई पुरानी धुन बज रही हो। हाथ मिलाया तो लगा जैसे रेशम की कोई पंखुड़ी मेरी हथेली पर रुक गई हो। मुलायम, गर्म, और थोड़ा काँपती हुई।उसके बाद से छोटी-छोटी मुलाकातें बढ़ने लगीं। कभी चाय के बहाने, कभी किताब की बात पर। मैंने देखा, उसके शरीर में एक ऐसी लचकपन है जो स्पर्श करने को बुलाता है। कंधे चौड़े नहीं, पर मजबूत; कमर पतली, पर उसमें एक कोमल वक्र था। जब हँसता, तो गालों पर गड्ढे पड़ जाते.
फिर वह शाम आई। T-20 विश्व कप का फाइनल। भारत खेल रहा था। मैंने सोचा, क्यों न इस रोमांच को साझा किया जाए। "आदित्य, आज मैच मेरे साथ देखोगे?" उसने तुरंत हाँ कहा, जैसे पहले से इंतजार कर रहा हो। "खाना खाकर आ जाना, फिर साथ बैठेंगे।" उसने मुस्कुराकर कहा, "ठीक है अंकल।"लगभग नौ बजे के आसपास वह आया। पाजामा और ढीली टी-शर्ट में। टी-शर्ट का कॉलर थोड़ा खुला हुआ था, जिससे गले की हल्की खोह दिख रही थी। जैसे जानबूझकर पहना हो — या शायद टेलीपैथी। मैंने उसे सोफे पर बगल में बिठाया। टीवी पर मैच शुरू हो चुका था। रोशनी कम थी, सिर्फ स्क्रीन की नीली चमक और एक छोटा-सा लैंप।
मैच की हर रोमांचक गेंद के साथ हमारा मन भी रोमांटिक होने लगा था। मैंने धीरे से अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। उसने विरोध नहीं किया। बल्कि थोड़ा और करीब सरक आया। मेरी उँगलियाँ उसकी कमर पर सरकीं — वहाँ की त्वचा इतनी नरम थी कि लगा जैसे कोई मखमल का परदा हिल रहा हो। उसकी साँसें तेज हुईं। मैंने फुसफुसाया, "कैसा लग रहा है?" उसने आँखें बंद करके सिर्फ सिर हिलाया — एक मौन "बहुत अच्छा"।धीरे-धीरे स्पर्श गहरा होता गया। मेरे हाथ उसके पेट पर, फिर जाँघों पर। उसकी जाँघें गर्म थीं, जैसे सूरज की किरणें अभी-अभी छूकर गई हों। उसने भी अपना हाथ मेरी पीठ पर रख दिया — हल्का-सा दबाव, जैसे कह रहा हो, "मैं भी चाहता हूँ।" हम दोनों की आँखें टीवी पर थीं, पर मन कहीं और।
मैच के हर छक्के पर निकटता बढ़ती जा रही थी ।एक पल आया जब मैंने उसे अपनी ओर खींच लिया। उसके गाल मेरे होंठों से छू गए। नरम, गरम, और थोड़े नम। मैंने धीरे से चूमा। उसने आँखें बंद कर लीं। मेरे हाथ उसके बालों में गए — मुलायम, घने, जैसे रेशम की लहरें। उसकी साँस मेरे कान पर लग रही थी — गर्म, तेज, और भरी हुई इच्छा से।
अब धीरे-२ हाथ थोड़ा पैजामे के अंदर सरकाया, लौंडा मैच देखने के बहाने से कुछ बोल नही रहा था, जब लौड़े की सेवा हो रही थी तो क्या बोलता और क्यों बोलता।पर लौड़ा खड़ा हो चुका था, और अनुज के अनुमान से थोड़ा बड़ा, और मोटा था (14×3.5 सेमी)। मैं प्रसन्न था कि चढ़ के लौंडा मजा देगा मैं समझ गया कि लौंडा गरमा गया है। मैने उसका लंड सहलाना शुरू किया, शायद अनपेक्षित घटनाक्रम के चलते लौंडा बहुत उत्तेजित हो गया, मुंह लाल हो गया और आंखे छोटी होने लगीं। और लो, 2 मिनट के घर्षण में छर्र-२ करके लौंडे का मॉल बाहर, और काफी कुछ मेरे हाथ में था, मैने पूछा मजा आया ? बोला अंकल बहुत, और आपको नए अवतार में देखा, मैने कहा, तुम खुश हुए जानकार आनंद आ गया।
मैंने पूछा, कभी मराया है। बोला नहीं अंकल, ओके कभी मारी है।बोला नहीं, मतलब सड़का लगाते रहे आज तक। हम उठे और कमरे की रोशनी कम कर दी। बिस्तर पर लेट गए। कोई जल्दबाजी नहीं। सिर्फ स्पर्श। मेरे हाथ उसके शरीर पर घूम रहे थे — कंधों से कमर तक, फिर जाँघों तक। उसकी त्वचा पर छोटे-छोटे रोमांच उठ रहे थे। उसने मेरी शर्ट उतारी, धीरे-धीरे। उसकी उँगलियाँ मेरी छाती पर नाच रही थीं — जैसे कोई संगीतकार कोई पुरानी रागिनी बजा रहा हो। मैंने उसके पाजामे का नाड़ा खोला और वह शरमा गया।
हमने एक-दूसरे को समय दिया। उसके शरीर की हर वक्र को सहलाया, हर स्पर्श में प्रेम डाला। उसकी साँसें मेरे कान में गूँज रही थीं — "और..." जैसे कोई प्रार्थना। मैंने उसके होंठों को फिर चूमा, गहराई से। उसकी जीभ मेरी जीभ से मिली — एक नृत्य, धीमा और मधुर।मेरे हाथ उसके नितंबों पर गए — गोल, कोमल, और गरम। मैने कहा, तेल लगाता हूं। तेल लगा के उसकी गांड़ में अंदर तक लगाते -२ गुपगुपा दिया। अब अपने लौड़े का तेलीकरण किया और उसकी गांड़ पर टिकाया, मैने कहा, थोड़ा दर्द होगा, पहली बार है, पर परेशान न होना, बाद में मजा आएगा। बोला ओके अंकल।
थोड़ा जोर लगाया तो टोपी आधी अंदर गई। लौंडा, आई मां, कह के चिल्ला पड़ा। मैने पूछा क्या हुआ। बोला, दर्द हुआ अंकल। मैने कहा ओके, थोड़ा तेल और लगाते हैं। बोला, ओके पर धीरे-2 प्लीज, मैने कहा ओके, और फिर से और क्रीम का लेपन लौड़े पर किया फिर वही प्रक्रिया लौड़ा गांड़ पर और इस बार कंधे के नीचे से हाथ डाल कर ग्रिप बनाकर पूरे जोर से घुसेड़ा।
लौंडा, अरे बाप रे मर गया अंकल, प्लीज निकाल लो। मैने कहा, बस थोड़ा दर्द सह ले, कह कर चोदना चालू कर दिया, एक मिनट बाद ही उसे मजा आने लगा और लौंडा आह आह कर रहा था दर्द से नहीं , बल्कि सुख से। फ़चाफ़च और गपागप की मादक आवाजें "वाह अंकल .." उसकी आवाज में एक गहरी संतुष्टि थी। मैंने धीरे-धीरे उसे ऊपर ले गया — लहरों की तरह, जो बढ़ती गईं, और फिर एक बड़े छोर पर टूट गईं।
वह सिहर उठा, फिर उसकी बारी आई।
उसने मुझे पलटा। उसकी आँखों में अब एक नई चमक थी — आत्मविश्वास की। उसने मेरे शरीर को सहलाया, चूमा, हर जगह। उसकी उँगलियाँ मेरी कमर पर, फिर नीचे। जब उसने मुझे छुआ, तो लगा जैसे बिजली की लहर दौड़ गई। मैंने उसे रोका नहीं। बल्कि खुद को खोल दिया।अब लौंडा चढ़ा और टोपी टिकाया, बोला घुसेड़ूं अंकल मैने सोचा मना करूंगा तो कौन सा मान जाएगा इस अवस्था में। मैने कहा ओके घुसेड़। लौंडे ने पहले राउंड में ही इतनी जोर से घुसेड़ा कि पूरी टोपी अंदर।
काफी दिन बाद के कारण कुछ वेदना हुई वैसे भी जवान लौंडे खतरनाक एनर्जी लेवल पर काम करते हैं। पहला अनुभव था लौंडे का लेकिन अच्छे से घपा घप घुसेड़ रहा था, लगभग 10-11 सेमी का अंदर बाहर मूवमेंट था। उधर भारत मैच जीत ही रहा था और इधर लौंडा मेरी हसीन गांड़ को तृप्त कर रहा था। लगभग लगभग 6-7 मिनट तक समगति से मेरा रसास्वादन करता रहा और लो।
सांस बढ़ गई और लौंडा स्खलित हो गया , जैसे लावा गिराया हो अंदर। और फिर मेरे ऊपर ही लेट गया और मेरी जांघों पर उसके हांथ का स्पर्श इतना संवेदनशील था कि दर्द की जगह अब सिर्फ सुख था। हम एक हो गए — धीरे-धीरे, गहराई से। उसकी हर हरकत में प्रेम था, इच्छा थी, और एक गहरा जुड़ाव।मैंने उसके माथे को चूमा। "कैसा लगा?" उसने मुस्कुराकर कहा, "जैसे पूरी जिंदगी इंतजार कर रहा था इस पल का।"हम देर तक लेटे रहे। मैच खत्म हो चुका था — भारत जीत गया था।
पर हमारे लिए असली जीत तो यह हसीन रात थी। उसने मेरी छाती पर सिर रखा। "फिर मिलेंगे?" मैंने कहा, "जब चाहो।" उसने मेरे होंठ चूमे — एक वादा।अगली रातें भी ऐसी ही रहीं। कभी किताबों के साथ, कभी संगीत के साथ, कभी सिर्फ चुप्पी में। हर बार एक नई खोज। उसके स्पर्श में अब एक परिचितता थी, पर हर बार नयापन। हमने सीखा कि कामुकता सिर्फ शरीर की नहीं — यह मन की, आत्मा की, और दो लोगों के बीच के उस अदृश्य धागे की बात है जो उन्हें बाँधे रखता है।
कभी-कभी वह मेरे पास आकर बस लेट जाता। मेरे हाथ उसके बालों में। हम बातें करते — सपनों की, डर की, इच्छाओं की। और फिर स्पर्श शुरू होता — धीमा, कोमल, अनंत।एक शाम उसने कहा, "आपके साथ समय बिताना... जैसे कोई किताब पढ़ना, जिसमें हर पन्ना नया सुख देता है।" मैंने हँसकर कहा, "तो यह किताब कभी खत्म मत होने देना।"और हमने वादा किया — यह कहानी जारी रहेगी, पन्ना दर पन्ना, स्पर्श दर स्पर्श। क्योंकि प्रेम और कामुकता का असली सौंदर्य यही है ।
भ्राता श्री की कहानी पढ़ते पढ़ते मेरे साथ साथ आप लोग भी चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर चुके होंगे।
Gay Sex Stories कैसी लगी, कृपया जरूर बताएं।
इस साइट के संचालक और पाठकों के लंबे चौड़े शिश्नों लिए मचलते मेरे नितंबों के साथ कहानी प्रकाशन की प्रतीक्षा में आपका प्रिय कामेश।

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