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मसूरी की वह यादगार रात - Gay Sex Stories

कामवासना साइट के संचालक जी के श्री चरणों में डॉ. कामेश का प्रणाम और सभी सुधी लेखकों, पाठकों के खड़े लंडों को नमन। मेरे लिए सेक्स, नग्नता, एक कहानी है जो मैं जीता हूँ और लिखता हूँ।


इस बार मैं मसूरी जाने वाला था, एक कॉन्फ्रेंस अटेंड करने। पहाड़ों की ठंडी हवा, हरी-भरी वादियाँ और वहाँ का शांत वातावरण मुझे हमेशा आकर्षित करता है। लेकिन इस बार का सफर कुछ खास था, क्योंकि मुझे पता था कि वहाँ वो लड़का है – राहुल। वो 20 साल का सुंदर, चिकना टॉप, जो उसी इंस्टीट्यूट में रिसर्च असिस्टेंट के तौर पर काम करता है।


हमारी पहचान पुरानी थी; दो साल पहले उससे परिचय एक गे सेक्स साइट पर हुआ था। अभी तक हमारी बातें सिर्फ विडियो कॉल तक सीमित रहीं, लेकिन उसकी आँखों में वो चमक दिखी वह बता रही थी कि वो एक अच्छा टॉप और सेक्सी लौंडा है।


मसूरी पहुँचते-पहुँचते शाम के चार बज चुके थे। ठंडी हवा मेरे जिस्म को छू रही थी, और मैं सोच रहा था कि काश राहुल से मिलन हो जाए। इंस्टीट्यूट का गेस्ट हाउस लण्डौर कैंटॉन्मेंट पर पहाड़ी पर था, मेरा कमरा नंबर 209 ऊपरी मंजिल पर था, बड़ा सा, एक बालकनी के साथ जहाँ से दिखती पूरी लैंडोर घाटी।मैंने दरवाज़ा बंद किया, कपड़े उतारे, और नग्न होकर खिड़की के पास खड़ा हो गया।


ठंडी हवा मेरे उरोजों को छू रही थी, निप्पल सख्त हो गए। मैंने आँखें बंद कीं और राहुल को याद किया – बीस वर्ष का वह तरुण, जिसकी आँखें हिरणी-सी थीं और हँसी में मादकता घुली रहती थी। गेस्ट हाउस में अपने कमरे में अकेला होने का फायदा ये था कि मैं नंगा रह सकता था। मेरी आदत है – जब बाहर ड्यूटी पर जाता हूँ तो रात को मैं कपड़े उतारकर सोता हूँ। नंगेपन में एक आजादी है, एक कामुकता जो मुझे लिखने की प्रेरणा देती है।


मैंने अपना लैपटॉप खोला और अपनी नई कहानी पर काम शुरू किया, लेकिन मन राहुल पर अटका था। क्या वो आएगा? मैंने उसे मैसेज किया था, लेकिन कोई रिप्लाई नहीं आया।कॉन्फ्रेंस अगले दिन से शुरू होनी थी। मैंने डिनर किया – सादा सा, दाल-रोटी आलू की सब्जी और सलाद। फिर कमरे में लौट आया। रात के 10 बज चुके थे। बाहर हल्की बारिश भी शुरू हो गई थी, ठंडी बूँदें खिड़की पर टपक रही थीं। मैं बिस्तर पर नंगा लेटा था, लाइट सिर्फ टेबल लैंप की। बाहर बारिश हो रही थी। मेरा जिस्म गर्म था, मन में एक उत्तेजना थी।


तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। मैं चौंक गया। कौन हो सकता है इतनी रात? मैंने चादर भी नहीं ओढ़ी, नंगा ही दरवाजा खोला। वहाँ खड़ा था मेरी विडियो काल्स वाला राहुल। उसकी मुस्कान वैसी ही थी – शरारती, आकर्षक।


वो गीला हो चुका था बारिश से, उसकी टी-शर्ट उसके चिकने छाती पर चिपकी हुई थी। "सर, सरप्राइज!" वो बोला, और अंदर आ गया।"राहुल, तुम? इतनी रात को?" मैंने पूछा, लेकिन दिल जानता था कि ये सरप्राइज नहीं, प्लान था। वो हँसा, "आपने मैसेज किया था न? मैं हॉस्टल से से आ रहा हूँ। मैंने कहा राहुल तुम तो भीग गए हो, उसने कहा "सर, आप ऐसे ही रहते हैं? वाह, क्या बॉडी है आपकी।"


वो करीब आया, उसके हाथ मेरी कमर पर रखे। मैंने विरोध नहीं किया; मैं तो इंतजार ही कर रहा था। उसने अपना शर्ट उतारा। उसका ऊपरी धड़ रोशनी में चमक रहा था – चौड़ी छाती, गहरी नाभि, और कंधों पर हल्की-हल्की मांसपेशियाँ जो जिम में नहीं, पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते बनी थीं। उसने अपनी जींस उतारी, और उसका लंड बाहर आया – करीब 16 -17 सेमी लंबा और 3.6 इंच का, मोटा, चिकना। मैंने उसके लंड को लपक कर अपने हांथ में थाम थामा और थोड़ा झुक कर शिस्नमुंड को हल्के से आजाद किया, उत्तेजना से पूरा प्री -कामरस टपकने लगा।


उसने एक कदम बढ़ाया और मेरे उरोजों पर अपना दाहिना हाथ रख दिया – हथेली गर्म, उंगलियाँ ठंडी। धीरे-धीरे उसने अंगूठे से मेरे निप्पल को गोल-गोल घुमाया। मेरी साँसें भारी हो गईं।“आपकी छाती कितनी कोमल है, सर,” उसने फुसफुसाया, “जैसे कश्मीरी सेब… छूते ही रस छलकने लगता है।”मैंने कुछ कहना चाहा, पर उसने अपना बायाँ हाथ मेरे नितंब पर रख दिया। उसकी हथेली मेरे नितंब की गोलाई में पूरी तरह समा गई। उसने धीरे से दबाया, फिर उंगलियों से चुटकी काटी – न दर्द हुआ, न सुख, बस एक गहरी लहर सी उठी जो रीढ़ से सिर तक चली गई। उसने मुझे बिस्तर तक धकेल दिया। उसने मुझे पीठ के बल लिटाया और मेरे ऊपर झुक आया।


उसके होंठ मेरे होंठों पर नहीं, मेरी गर्दन पर आए – धीरे से चूमा, फिर जीभ से एक लंबी रेखा खींची जो मेरे कंठ से होती हुई वक्ष तक पहुँची। वहाँ पहुँचकर उसने मेरे दाहिने उरोज को होंठों से घेर लिया। उसकी जीभ निप्पल पर नाच रही थी – कभी हल्के से चक्र बनाती, कभी तेज़ी से थरथराती। मैंने उसका सिर अपनी छाती पर दबा लिया।


अब उसने मुझे अपने ऊपर पलटा लिया और उसका औज़ार मेरे मुंह के सामने था जिसे मेरे होठों ने अपने मे भर लिया। वैसे मुझे चूसना ख़ास पसंद नहीं है लेकिन अपने प्रेमी को उत्तेजित करने मे इसका काफी रोल होता है, जैसा कि भ्राता श्री दीक्षा से मैंने जाना है, इसी लिए 5 मिनट तक उसके प्रीकम का खारा स्वाद लेता रहा। उसका लौड़ा अब गरम लौहदंड की मानिंद सख्त हो चुका था।


मेरे नितंब अपने आप ऊपर उठने लगे, जैसे उससे मिलने को बेचैन हों।राहुल ने मेरी दोनों टाँगें ऊपर उठाईं और मेरे नितंबों को अपने कंधों पर रख लिया। अब मेरी पूरी निचली कमर हवा में थी। उसने अपना चेहरा मेरे नितंबों के बीच छिपा दिया। उसकी नाक मेरी हसीन गाँड़ को सहला रही थी, होंठ कभी दाहिने नितंब को चूमते, कभी बाएँ को। मैंने महसूस किया कि मेरे नितंब अपने आप फैल रहे हैं, जैसे कोई फूल रात में खिलता है। उसने जीभ से एक लंबा, गहरा, गीला स्पर्श किया – ठीक बीचों-बीच। मेरी कमर में करंट दौड़ गया।“राहुल…” मैंने धीरे से उसका नाम लिया। “शशश…” उसने कहा, “आज रात आपकी हर साँस मेरे नाम की होगी।


उसने कोल्ड क्रीम की ट्यूब खोली जो पास में दर्पण के पास रखी– कोई जल्दबाजी नहीं थी। पहले उसने अपनी उंगलियाँ गर्म कीं, फिर मेरे नितंबों के बीच धीरे-धीरे मालिश शुरू की। एक उंगली अंदर गई, फिर दो। वह धीरे-धीरे घुमाता रहा, जैसे कोई संगीतकार वायलिन की तारों को साध रहा हो। मेरे नितंब अब पूरी तरह खुल चुके थे, उसकी हर हरकत का स्वागत कर रहे थे।जब उसने अपने लंड के टोपे को मेरी हसीन गाँड़ के छेंद पर रखा, तो मैंने साँस रोक ली। वह रुका, मेरी आँखों में देखा, और धीरे-धीरे भीतर सरकने लगा।


दर्द था, पर उस दर्द में एक अनोखी मिठास थी – जैसे पहाड़ी झरने का ठंडा पानी पहली बार गले से उतरता है। जब वह पूरी तरह भीतर था, तो हम दोनों कुछ पल यूँ ही रहे – दो पहाड़ एक-दूसरे में समा गए हों जैसे।फिर उसने गति शुरू की – पहले धीमी, लंबी, फिर थोड़ी तेज़। मेरे नितंब उसके हर धक्के का जवाब दे रहे थे। कभी मैं पीछे की ओर धकेलता, कभी वह आगे बढ़ता। "फच... फच..." की आवाजें कमरे में गूँज रही थीं। वह मेरा लंड पकड़ कर हिलाने लगा, लेकिन मैंने कहा "नहीं, सिर्फ मेरी गांड मारो।" उसके हाथ मेरे उरोजों पर थे – कभी दबाते, कभी सहलाते। मेरे निप्पल उसके अंगूठों और तर्जनियों के बीच थे। हर चुटकी में मेरी सारी चेतना नितंबों और उरोजों के बीच केंद्रित हो जाती। हमारा तालमेल ऐसा था जैसे वर्षों से एक-दूसरे को जानते हों।


जब मैं चरमोत्कर्ष के करीब था, तो उसने अपनी गति और धीमी कर दी। मेरे उरोजों को अपने होंठों से पकड़ा और तेज़ी से चूसा। मैंने उसकी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। मेरी सारी ऊर्जा एक बिंदु पर केंद्रित होकर फूट पड़ी – बिना हाथ लगाए, सिर्फ नितंबों की गति से। उसी क्षण उसने भी अपनी गति बढ़ाई और मेरे भीतर गहरे तक समा गया। मैंने उसकी गर्माहट और गरम गरम लावे को अपने अंतस्तल में महसूस किया।

लेकिन रात खत्म नहीं हुई। राहुल ने ब्रेक लिया, हमने पानी पिया, बातें कीं। वो मेरी किताबों, मेरी फ़ोटोग्राफ, और मेरे सीनियर गुरु भ्राता श्री के बारे में पूछ रहा था। "सर, आपकी कहानियाँ पढ़कर मैंने बहुत कुछ सीखा। आज मेरी मिलने की तमन्ना पूरी हुई। हम कुछ देर एक-दूसरे से लिपटे लेटे रहे। उसका सिर मेरी छाती पर था, मेरी उंगलियाँ उसके बालों में।


फिर उसने उठकर मुझे घुमाया – अब मैं पेट के बल था। उसने तकिया मेरी कमर के नीचे रख दिया ताकि मेरे नितंब ऊपर उठ जाएँ। उसने मेरे दोनों नितंबों को अपने हाथों में लिया, जैसे कोई मिट्टी का घड़ा सँभालता है। उसकी उंगलियाँ मेरे नितंबों की गोलाई में डूब रही थीं।फिर उसने अपना चेहरा मेरे नितंबों के बीच छिपा दिया। उसकी जीभ ने फिर वही जादू किया – लंबे, गहरे, गीले स्पर्श। मेरे नितंब अपने आप और ऊपर उठ गए। जब वह भीतर आया, इस बार बिना किसी रुकावट के – जैसे मेरे शरीर ने उसे अपना लिया हो। वह धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे गति करने लगा। उसके हाथ मेरी पीठ पर थे, मेरी कमर पर, फिर मेरे उरोजों तक पहुँचे। उसने मुझे थोड़ा ऊपर उठाया ताकि मेरी छाती भी हवा में हो। अब वह पीछे से मेरे उरोजों को मसल रहा था, निप्पल्स को चुटकी काट रहा था, और नितंबों में गहरे धक्के मार रहा था। हमारी चुदाई मे एक लय थी – जैसे कोई पुराना राग बज रहा हो। मैंने महसूस किया कि मेरे नितंब अब पूरी तरह उसके हैं – उनकी हर हरकत, हर गति उसके नियंत्रण में। जब हम दोनों साथ-साथ ऊँचाई पर पहुँचे, तो बाहर कोहरा छँटने लगा था। और चाँदनी खिड़की से भीतर झाँकने लगी थी।राहुल बोला, "कल फिर आऊँगा सर।" और अपने हास्टल को चला गया।


दूसरी रात को हमने बालकनी में पूरी मस्ती की। हम दोनों नग्न थे। चाँद पूरा था, उसकी रोशनी हमारे शरीर पर चाँदी सी बिखेर रही थी। उसने मुझे रेलिंग से सटा दिया। मेरे नितंब ठंडी लकड़ी की रेलिंग से सटे थे। उसने पीछे से आकर मुझे अपनी बाहों में भर लिया। उसके हाथ मेरे उरोजों पर थे – धीरे-धीरे मसलते, निप्पल्स को उंगलियों से सहलाते।जब वह भीतर आया, तो चाँदनी में उसका चेहरा और भी सुंदर लग रहा था। हमने फिर संभोग किया – जैसे समय रुक गया हो। उसके हर धक्के के साथ मेरे नितंब हल्के से हिलते, और मेरे उरोज उसके हाथों में सिकुड़ते-फैलते। हमने कोई जल्दी नहीं की। जब हम क्लाइमैक्स पर पहुँचे, तो मैंने पीछे मुड़कर उसके होंठ अपने होंठों से छू लिए। उसकी गर्माहट मेरे भीतर बिखर गई।अंदर आकर उसने मुझे गोद में उठाया और बिस्तर पर लिटाया। इस बार वह मेरे ऊपर था, मेरी टाँगें उसके कंधों पर। उसने मेरे उरोजों को अपने होंठों से ढँक लिया, और बहुत धीरे-धीरे, बहुत प्यार से भीतर-बाहर होने लगा। हमारी साँसें एक हो गई थीं। जब अंतिम क्षण आया, तो हम दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा और साथ-साथ मुक्त हो गए। तीन राउंड वासना का खेल खेला गया। सुबह जब वह गया, तो मेरे नितंबों पर उसकी उंगलियों की छुवन का और मेरे उरोजों पर होंठों के स्पर्श की स्मृति बाकी थी। यह मेरी नई किताब के पहले शब्द होंगे।


यह Gay Sex Stories कैसी लगी, आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।

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