मैंने और दीदी ने मिलके कामवाली की प्यास बुझाई: Antarvasna Story
- Kamvasna
- 3 days ago
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अन्तर्वासना कभी-कभी ऐसे रूप में सामने आती है जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती, और जब घर की चारदीवारी के अंदर ही एक ऐसा राज़ छुपा हो जो आपकी पूरी सोच बदल दे, तो फिर ज़िंदगी कभी भी पहले जैसी नहीं रहती। ये कहानी मेरी अपनी सगी बहन आरती और हमारी कामवाली दीदी संगीता की है, जिसमें मैं और मेरी लेस्बियन बहन ने मिलकर संगीता दीदी की प्यास बुझाई थी। ये मेरी ज़िंदगी का सबसे गुप्त और अनोखा अनुभव है, जिसे मैं हमेशा छुपा कर रखना चाहता था, लेकिन आज मैं अपनी इस Antarvasna को आपके सामने बयां करने जा रहा हूँ। मेरा नाम विक्रम है और मैं भोपाल का रहने वाला हूँ, उस वक़्त मेरी उम्र 24 साल थी और मैं अपने माता-पिता और बड़ी बहन आरती के साथ एक सुंदर से घर में रहता था। मेरी बहन आरती मुझसे दो साल बड़ी है, यानी उस वक़्त वो 26 साल की थी, और उसकी एक खास बात थी जो घर में सिर्फ मुझे ही पता थी कि वो लड़कियों की तरफ आकर्षित होती है, यानी वो लेस्बियन थी।
आरती दीदी दिखने में बेहद खूबसूरत थीं, लेकिन उनकी खूबसूरती में एक अलग तरह का निखार था जो शायद उनके इस राज़ की वजह से और भी गहरा हो गया था। उनका रंग गेहुँआ सा साफ़ था, बाल छोटे और स्टाइलिश कटे हुए, और आँखों में एक गहरी शरारत रहती थी। वो अकसर शर्ट और जींस पहनती थीं और उनकी चाल में एक मर्दाना सा अंदाज़ था, लेकिन उनका जिस्म पूरी तरह से औरतों जैसा ही था, भरा हुआ और मुलायम। हमारे घर में संगीता दीदी काम करने आती थीं, जो उम्र में करीब 30 साल की थीं और शादीशुदा थीं, लेकिन उनके पति अकसर बाहर रहते थे और वो अकेली ही अपना जीवन चला रही थीं। संगीता दीदी का जिस्म भी किसी गर्म आग से कम नहीं था, उनका रंग साँवला सा आकर्षक था, सीना भरा हुआ और कमर पतली, और उनकी आँखों में हमेशा एक अजीब सी प्यास झलकती थी जो शायद उनके अकेलेपन की वजह से और बढ़ गई थी।
आरती दीदी और संगीता दीदी के बीच अकसर बातें होती रहती थीं और मैंने कई बार गौर किया था कि आरती दीदी उन्हें बड़े गौर से देखती रहती थीं। वो जब संगीता दीदी झाड़ू लगातीं या बर्तन साफ करतीं, तो आरती दीदी उनके झुकते हुए शरीर को निहारती रहतीं। एक दिन मैंने आरती दीदी से पूछ ही लिया, |दीदी, तुम संगीता दीदी को इतना क्यों देखती रहती हो?| उसने मुस्कुराते हुए कहा, |विक्रम, तुम समझोगे नहीं, लेकिन संगीता दीदी में एक अलग ही कशिश है, और मुझे लगता है कि वो भी अंदर से मेरी तरह ही है, बस शायद उसे खुद इसका एहसास नहीं है।| मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा और कहा, |मतलब?| उसने कहा, |मैं उसकी आँखों में अपनी ही तरह की भूख देखती हूँ, और एक दिन मैं उसका सच जानकर ही रहूंगी।| ये सुनकर मेरे अंदर भी एक जिज्ञासा पैदा हुई और मैं सोचने लगा कि क्या सच में संगीता दीदी के मन में भी ऐसी ही कोई छुपी हुई चाहत है।
फिर एक शुक्रवार की दोपहर की बात है। मेरे माता-पिता किसी शादी में इंदौर गए हुए थे और पूरे हफ्ते के लिए बाहर थे, और घर में सिर्फ मैं और आरती दीदी थे। संगीता दीदी हमेशा की तरह सुबह काम करने आई थीं। बाहर मौसम बदल रहा था और ठंडी हवा चल रही थी, और घर में सन्नाटा था। मैं अपने कमरे में बैठा लैपटॉप पर काम कर रहा था, तभी मुझे आरती दीदी और संगीता दीदी की बातचीत की आवाज़ें सुनाई दीं। वो दोनों किचन में थीं और उनकी हँसी मुझे साफ सुनाई दे रही थी। मैं उठकर किचन की तरफ गया और देखा कि आरती दीदी संगीता दीदी के काफी करीब खड़ी थीं और उनके कंधे पर हाथ रखकर बात कर रही थीं। संगीता दीदी शरमा रही थीं और उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। मुझे देखकर आरती दीदी ने कहा, |विक्रम, आओ, संगीता दीदी हमें अपनी ससुराल की कहानियाँ सुना रही हैं।| मैं भी हँसते हुए वहीं बैठ गया।
बातों-बातों में पता चला कि संगीता दीदी अपने पति से काफी परेशान हैं क्योंकि वो उन्हें समय नहीं देते और उनकी ज़रूरतों को नहीं समझते। संगीता दीदी ने कहा, |पता नहीं, शादी करके भी मैं बहुत अकेली महसूस करती हूँ, मेरा मन तो रोज़ उदास रहता है।| ये सुनकर आरती दीदी ने उनके हाथ को सहलाते हुए कहा, |संगीता दीदी, कभी-कभी प्यार किसी और रूप में भी मिल सकता है, बस नज़रें सही होनी चाहिए।| संगीता दीदी ने हैरानी से उसकी तरफ देखा और कहा, |क्या मतलब?| आरती दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा, |मेरा मतलब है कि औरतें भी औरतों को प्यार कर सकती हैं, और वो प्यार कई बार मर्दों के प्यार से भी गहरा और सच्चा होता है।| ये सुनकर संगीता दीदी की आँखें चौड़ी हो गईं और उनके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी उभर आई। उन्होंने धीरे से कहा, |आरती दीदी, ये कैसी बातें कर रही हो?| आरती दीदी ने उनके करीब जाकर कहा, |मैं सच कह रही हूँ संगीता दीदी, और मैं जानती हूँ कि तुम्हारे दिल में भी कुछ वैसी ही चाहत है, बस तुम मान नहीं रहीं।|
संगीता दीदी कुछ बोल नहीं पाईं और उनकी साँसें तेज़ हो गईं। आरती दीदी ने धीरे से उनके गाल पर हाथ रखा और अपने होंठ उनके होंठों पर रख दिए। संगीता दीदी ने पहले तो थोड़ा विरोध किया, लेकिन फिर उनकी आँखें बंद हो गईं और उन्होंने भी आरती दीदी के चुम्बन को स्वीकार कर लिया। मैं ये सब सामने बैठा देख रहा था और मेरी अपनी भी साँसें थम गई थीं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अपनी बहन को किसी और औरत को चूमते हुए देखूंगा। लेकिन ये नज़ारा बेहद खूबसूरत और कामुक था। आरती दीदी ने संगीता दीदी को अपनी बाहों में भर लिया और उन्हें गहराई से चूमने लगीं। उनकी ज़बानें एक-दूसरे से उलझ रही थीं और दोनों की साँसें मिल रही थीं। संगीता दीदी ने अपनी आँखें खोलीं और मेरी तरफ देखा, और मैंने उनकी आँखों में शर्म, हवस और असमंजस तीनों एक साथ देखा। लेकिन उन्होंने आरती दीदी को रोका नहीं, बल्कि और भी ज़ोर से पकड़ लिया।
आरती दीदी ने संगीता दीदी की साड़ी का पल्लू हटाया और उनके कंधों पर किस करने लगीं। संगीता दीदी के मुँह से हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं, |उह्ह्ह्ह… आरती…| फिर आरती दीदी ने उनके ब्लाउज़ के हुक खोलने शुरू कर दिए और देखते ही देखते संगीता दीदी के स्तन बाहर आ गए। वो दोनों स्तन गोल, साँवले और भरे हुए थे और उनके निप्पल सख्त हो चुके थे। आरती दीदी ने उनके एक स्तन को अपने मुँह में ले लिया और दूसरे को अपने हाथ से मसलने लगीं। संगीता दीदी ज़ोर से कराह रही थीं और उनके पैर काँप रहे थे। मैं अभी भी वहीं बैठा था और मेरा लंड मेरी पैंट में सख्त हो चुका था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे वहाँ से जाना चाहिए या रुकना चाहिए। तभी आरती दीदी ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा, |विक्रम, शर्माओ मत, तुम भी आओ, संगीता दीदी को आज हम दोनों से पूरा प्यार मिलेगा।|
ये सुनकर मेरे दिमाग में हलचल मच गई, लेकिन मेरे शरीर ने मुझे आगे बढ़ने का इशारा किया। मैं धीरे-धीरे उनके पास गया और संगीता दीदी के चेहरे को प्यार से सहलाया। उन्होंने अपनी नम आँखों से मेरी तरफ देखा और मुस्कुराईं। मैंने झुककर उनके होंठों को चूम लिया। उनके होंठ नर्म और गर्म थे, और उन्होंने मेरे चुम्बन को बड़े प्यार से स्वीकार किया। अब मैं उनके होंठों को चूम रहा था और आरती दीदी उनके स्तनों को चूस रही थीं। संगीता दीदी दोनों तरफ से घिरी हुई थीं और उनके शरीर से लगातार काँप निकल रही थी। मैंने उनकी साड़ी को पूरी तरह से उतार दिया और उन्हें सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज़ में छोड़ दिया। फिर आरती दीदी ने उनका पेटीकोट भी उतार दिया और अब संगीता दीदी सिर्फ अपनी पैंटी में थीं। उनका पेट सपाट था और जाँघें मुलायम, और उनकी पैंटी के बीच से हल्का सा गीलापन झलक रहा था।
आरती दीदी ने संगीता दीदी की पैंटी उतारी और उनकी टाँगों को फैला दिया। उनकी चुत से रस टपक रहा था और वो पूरी तरह से भीग चुकी थीं। आरती दीदी ने अपना चेहरा उनकी जाँघों के बीच रख दिया और उनकी चुत को चाटने लगीं। संगीता दीदी ज़ोर से चीख पड़ीं, |आआअह्ह्ह्ह… हाँ… आरती…| मैं उनके चेहरे के पास बैठा उन्हें चूम रहा था और उनके स्तनों को सहला रहा था। उनके मुँह से लगातार कराहट निकल रही थी और वो अपने हाथों से मेरे बालों को खींच रही थीं। आरती दीदी ने अपनी ज़बान उनकी चुत के अंदर डाली और उनके क्लिट को चूसने लगीं। संगीता दीदी का शरीर ऐंठ गया और वो मेरे होठों पर ज़ोर से चूमने लगीं। मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर अपनी पैंट खोली और अपने लंड को बाहर निकाल लिया। संगीता दीदी ने जब मेरा सख्त लंड देखा तो उनकी आँखों में एक और भी गहरी प्यास उभर आई। उन्होंने अपना हाथ बढ़ाकर मेरे लंड को पकड़ लिया और सहलाने लगीं।
कुछ देर बाद आरती दीदी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और संगीता दीदी की चुत से रस निकलकर उनके होठों पर चमक रहा था। उन्होंने कहा, |संगीता दीदी, तुम्हारी चुत से तो रस बह रहा है, कितनी प्यासी हो तुम।| संगीता दीदी ने शर्म से अपना चेहरा छुपा लिया और कहा, |तुम दोनों ने मुझे पागल कर दिया है।| फिर आरती दीदी ने मेरी तरफ देखा और कहा, |विक्रम, अब तुम संगीता दीदी को पूरा संतुष्ट करो, मैं देखती हूँ।| मैंने उन्हें सोफे पर लिटाया और उनकी टाँगों को अपने कंधों पर उठा लिया। संगीता दीदी ने अपने हाथ मेरी गर्दन में डाल दिए और मुझे अपनी तरफ खींच लिया। मैंने अपने लंड को उनकी चुत के मुहाने पर रखा और धीरे-धीरे अंदर सरकाया। उनकी चुत गर्म और नम थी और मेरा लंड आसानी से अंदर जा रहा था। जैसे ही मेरा पूरा लंड उनके अंदर गया, संगीता दीदी ने ज़ोर से सिसकारी भरी, |आआह्ह्ह्ह… विक्रम…| मैंने उनकी टाँगों को पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से चोदना शुरू कर दिया। हर एक धक्के के साथ उनके शरीर का कोना-कोना हिल रहा था और उनके मुँह से लगातार आवाज़ें निकल रही थीं। आरती दीदी पास बैठकर हमारी चुदाई का नज़ारा देख रही थीं और बीच-बीच में संगीता दीदी के स्तनों को सहला रही थीं।
कुछ देर तक मिशनरी पोज़ीशन में चोदने के बाद संगीता दीदी ने कहा, |अब मैं ऊपर आकर चुदवाना चाहती हूँ।| ये सुनकर मैंने अपना लंड बाहर निकाला और पीठ के बल लेट गया। संगीता दीदी मेरे ऊपर सवार हुईं और उन्होंने खुद मेरे लंड को अपनी चुत में डाल लिया। अब वो मेरे ऊपर उछल रही थीं और मैं उनके उछलते हुए स्तनों को देख रहा था। आरती दीदी ने पीछे से आकर संगीता दीदी के बाल पकड़े और उनकी गर्दन पर किस करने लगीं। संगीता दीदी की चुदाई का आनंद अब दोगुना हो गया था, क्योंकि आगे से मेरा लंड उन्हें चोद रहा था और पीछे से आरती दीदी उन्हें प्यार कर रही थीं। वो बार-बार कह रही थीं, |उह्ह्ह्ह… मैं तुम दोनों के बिना नहीं रह सकती…| उनकी ये बातें मुझे और भी उत्तेजित कर रही थीं।
फिर आरती दीदी ने मुझसे कहा, |विक्रम, अब तुम थोड़ा आराम करो, मुझे भी संगीता दीदी के साथ कुछ पल अकेले बिताने दो।| मैंने हाँ कहा और संगीता दीदी के ऊपर से उठकर पास ही बैठ गया। आरती दीदी ने संगीता दीदी को अपनी बाहों में भर लिया और उन्हें गहराई से चूमने लगीं। फिर उन्होंने संगीता दीदी को बेडरूम में ले जाकर लिटा दिया और खुद भी अपने कपड़े उतार दिए। अब दोनों औरतें बिल्कुल नंगी थीं और एक-दूसरे के जिस्म को चूम और सहला रही थीं। आरती दीदी ने संगीता दीदी की चुत को फिर से चाटना शुरू किया और संगीता दीदी ने भी आरती दीदी की चुत को अपने मुँह से चूसना शुरू कर दिया। दोनों एक-दूसरे के साथ 69 पोज़ीशन में लिपटी हुई थीं और उनके शरीर से लगातार रस बह रहा था। मैं वहीं खड़ा होकर ये सब देख रहा था और मेरा लंड फिर से सख्त हो गया था। दोनों की कराहटें पूरे कमरे में गूंज रही थीं और माहौल पूरी तरह से गर्म हो चुका था।
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कुछ देर बाद आरती दीदी ने संगीता दीदी से कहा, |अब हम दोनों मिलकर विक्रम को भी संतुष्ट करेंगे।| और वो दोनों मेरी तरफ बढ़ीं। संगीता दीदी ने मेरे लंड को अपने मुँह में ले लिया और आरती दीदी ने मेरे बॉल्स को चूसना शुरू कर दिया। मैं खड़ा-खड़ा दोनों का मज़ा ले रहा था और मेरी साँसें तेज़ हो गई थीं। संगीता दीदी मेरे लंड को गहराई से चूस रही थीं और आरती दीदी मेरे बॉल्स पर अपनी ज़बान घुमा रही थीं। मुझे लगा कि अब मैं रिलीज़ करने वाला हूँ। मैंने कहा, |दीदी, मैं अब रिलीज़ करने वाला हूँ।| संगीता दीदी ने मेरे लंड को और ज़ोर से चूसना शुरू कर दिया और मैंने अपना सारा माल उनके मुँह में छोड़ दिया। उन्होंने मेरे माल को पूरा निगल लिया और फिर अपनी ज़बान से मेरे लंड को साफ कर दिया।
उसके बाद हम तीनों ने साथ में नहाया और फिर किचन में जाकर कुछ खाया। संगीता दीदी के चेहरे पर अब एक अलग ही चमक थी और उनकी आँखों की प्यास जैसे थोड़ी शांत हुई थी। उन्होंने कहा, |आज मुझे पहली बार सच्चा प्यार और पूरा संतोष मिला है।| आरती दीदी ने उन्हें गले लगा लिया और मैंने दोनों को प्यार से देखा। उस दिन के बाद से हम तीनों के बीच एक गहरा और अनोखा रिश्ता बन गया था। संगीता दीदी अब हमारे घर सिर्फ काम करने ही नहीं आती थीं, बल्कि हम तीनों अकसर साथ में वक्त बिताते और अपनी अन्तर्वासना को एक-दूसरे के साथ जीते थे। मेरी बहन आरती की लेस्बियन चाहत और संगीता दीदी की छुपी हुई प्यास दोनों को एक साथ मिलाकर हमने एक ऐसा रिश्ता बनाया था जिसमें कोई शिकायत नहीं थी, सिर्फ प्यार और संतोष था।
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