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विधवा बेटी को पापा ने कामसूत्र सिखाया - Free Sex Kahani

  • Kamvasna
  • 10 जन॰
  • 4 मिनट पठन

मेरा नाम राधा है। मैं अभी सिर्फ छब्बीस साल की हूँ। शादी को पाँच साल हुए थे और अचानक एक सड़क हादसे में मेरा पति चल बसा। विधवा होकर मैं मायके लौट आई। मायके में सिर्फ मैं और पापा थे। माँ को गए दस साल हो चुके थे। पापा उस समय पचास के करीब थे, लेकिन गाँव में खेती-बाड़ी और मजदूरी करने की वजह से उनका बदन अभी भी जवान और ताकतवर था। चौड़े कंधे, मजबूत सीना, और नीचे वो मोटा लंड जिसकी झलक कभी-कभी मुझे बचपन में दिख जाती थी जब वो नहाकर बाहर आते थे।


विधवा होने के बाद मैं सफेद साड़ी पहनने लगी थी। दिन भर घर के काम करती, शाम को पूजा-पाठ, फिर रात को अकेले कमरे में लेटकर पुरानी यादों में खो जाती। पति मुझे बहुत प्यार से चोदता था, रोज रात को। उसकी कमी अब बहुत खल रही थी। मेरी चूत फिर भी जवान थी, गुलाबी और चिकनी, बस अब कोई हाथ नहीं लगाता था। रातों में मैं उँगलियाँ करके शांत हो जाती, लेकिन वो मजा कहाँ जो असली लौड़े से मिलता है।


पापा भी अकेले थे। माँ के जाने के बाद उन्होंने दूसरी शादी नहीं की। गाँव की कुछ औरतों से अफेयर की बातें सुनी थीं, लेकिन घर में कभी कुछ नहीं लाए। अब मैं घर में थी तो वो मुझे बेटी की तरह ही प्यार करते, लेकिन कभी-कभी उनकी नजरें मेरे बदन पर ठहर जातीं। मेरी कमर, मेरे स्तन, मेरी गांड। मैं महसूस करती, लेकिन कुछ कहती नहीं।


एक रात बारिश हो रही थी। बिजली की कड़कड़ाहट से मैं डरकर उठी और पापा के कमरे में चली गई। “पापा, डर लग रहा है,” मैं बोली और उनके बिस्तर पर लेट गई। पापा ने मुझे गले लगा लिया। उनका बदन गर्म था। मैंने महसूस किया कि उनका लौड़ा मेरी जाँघ से टकरा रहा है और धीरे-धीरे सख्त हो रहा है। मैं चुप रही। पापा का हाथ मेरी पीठ पर फिरता रहा, फिर धीरे से मेरी कमर पर। मैंने भी आँखें बंद कर लीं।


अगली रात फिर मैं उनके कमरे में गई। इस बार जानबूझकर। पापा ने कुछ नहीं कहा, बस मुझे बाहों में भर लिया। उनका हाथ मेरी साड़ी के ऊपर से मेरे स्तनों को सहलाने लगा। मैंने सिसकारी ली, आह्ह…। पापा ने मेरे कान में फुसफुसाया, “बेटी, तेरी जवानी बेकार जा रही है। तेरा पति तो चला गया, लेकिन तेरी चूत अभी भी नई-नई है। मैं तेरे पापा हूँ, लेकिन मर्द भी हूँ। अगर तू चाहे तो मैं तेरी प्यास बुझा सकता हूँ।”


मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनके सीने पर सिर रख दिया। पापा ने समझ लिया। उन्होंने मेरे होंठ अपने होंठों से छू लिए। पहला चुंबन हल्का था, फिर गहरा। उनकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। मैंने भी जवाब दिया। हम देर तक एक-दूसरे के होंठ पीते रहे।


फिर वो रात आ ही गई जिसका हमें दोनों को इंतजार था। मैं सफेद साड़ी में थी। पापा मेरे कमरे में आए और बोले, “बेटी, आज से तू मेरी है।” मैंने शरमाते हुए सिर झुका लिया। पापा ने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरे होंठ पीने लगे। अब मैं मंगलसूत्र नहीं पहनती थी, विधवा थी। पापा के हाथ मेरे स्तनों पर गए, जोर-जोर से दबाने लगे। मेरी कसी हुई गोल छातियाँ उनके हाथों में मसल रही थीं। मुझे नशा चढ़ने लगा, आह्ह… ह्ह्ह…।


कुछ देर बाद मैं बिलकुल बेकाबू हो गई। “चोद दो पापा, अब मत तड़पाओ, अपनी विधवा बेटी को चोद डालो,” मैंने कराहते हुए कहा।


पापा ने मेरे सारे कपड़े उतार दिए। ब्लाउज, साड़ी, पेटीकोट, ब्रा, पैंटी। मैं पूरी नंगी उनके सामने थी। “बेटी, तू अपनी माँ से भी ज्यादा सुंदर है,” पापा बोले। फिर वो मेरे ऊपर लेट गए और मेरी नर्म गर्म छातियों को चूसने लगे। “तेरा पति तुझे रोज चोदता था न?” वो बोले।


“हाँ पापा, रोज रात को, बिना चोदे उसे नींद नहीं आती थी,” मैंने कहा।


पापा ने मेरी नुकीली छातियों को दाँत से काटा, जोर-जोर से चूसा। मुझे दर्द और मजा दोनों आ रहे थे, ओह्ह… आह्ह…। वो मेरी छातियों को खा जाना चाहते थे। निप्पल्स पर जीभ फेरते, दबाते, देर तक खेलते रहे।


फिर उनकी नजर मेरी चूत पर गई। मेरी झाँटें घनी थीं क्योंकि किसी ने छुआ नहीं था। “झाँटें बाद में बनाएँगे, पहले चोद लूँ,” पापा बोले और मेरी बुर चाटने लगे। झाँटों के जंगल में उनका चेहरा छिप गया। जीभ से चूत के होंठ चाटे, दाना सहलाया, जीभ अंदर डाली। मैं तड़प उठी, इह्ह… आह्ह… ओह्ह…। मेरे मूत की बूँदें तक वो पी गए।


फिर कई उँगलियाँ डालकर चूत फेटी। मेरी चुदास आसमान छूने लगी। आखिरकार पापा ने अपना मोटा लौड़ा मेरी गुलाबी चूत में डाला और जोर-जोर से धक्के मारने लगे। खट-खट… पट-पट…। उनके झटके मेरे पति से भी तेज थे। मुझे लगा मैं स्वर्ग पहुँच रही हूँ, आह्ह… ह्हीईई… आअह्ह्ह…।


पापा ने मुझे सीने से लगाया और ताबड़तोड़ पेलकर अपना गर्म माल मेरी चूत में छोड़ दिया। हम दोनों थककर सो गए। सुबह देर से उठे। पापा बोले, “आज सारा दिन नंगे रहेंगे।” मैं नंगी ही खाना बनाई, नंगी ही खाया। खाते वक्त पापा की उँगलियाँ मेरी चूत में थीं।


दोपहर में फिर चुदाई। इस बार खड़े-खड़े, डाइनिंग टेबल के सहारे। पापा ने मेरी पीठ और गांड पर दाँत गड़ाए, फिर पीछे से लौड़ा पेल दिया। गच-गच… पट-पट…। मैंने चूत सिकोड़ी, ज्यादा रगड़ ली, ऊऊ… उईईई…। पापा ने फिर मेरी चूत में झड़कर मुझे अपनी रंडी बना लिया।


एक हफ्ते बाद तो हमारा रिश्ता पूरी तरह बदल चुका था। बाहर मैं सफेद साड़ी में विधवा, घर में रंगीन साड़ी, सिंदूर, गजरा, लिपस्टिक लगाकर पापा की दुल्हन बनती। रात को उनके कमरे में जाकर सीने पर लेटकर चुदवाती। पापा रोज मेरी चूत मारते, मेरे बदन पर अपना हक जमाते।


मेरे पति के जाने से अगर किसी को सबसे ज्यादा फायदा हुआ तो वो मेरे पापा को। अब मैं उनकी प्यारी रंडी थी, उनकी निजी औरत। और मुझे भी वो सुख मिल रहा था जो सालों से तरस रही थी। हमारा ये कामसूत्र खेल रोज चलता रहा।


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