श्री के साथ घपाघप : Gay Sex Stories
प्रिय कामवासना के रसिक पाठकों तथा संयोजक मंडल के प्रति हार्दिक अभिवादन। मैं डॉ. कामेश, आपके सम्मुख एक बार पुनः उपस्थित हूँ, इस बार और अधिक गहन, अधिक रसपूर्ण तथा साहित्यिक शब्दावली से सज्जित एक अनुभव लेकर।
यह कथा है हमारे अनुभवी भ्राताश्री और एक उमंग भरी, चढ़ती जवानी के 19 वर्षीय गभरू श्री की, जिसकी काम-कुंजी ने मेरे अंतर्मन को पूर्णतः उद्वेलित कर दिया। उसकी चिकनी त्वचा, कसे हुए नितंब, और वह मधुर-कठोर लौड़ा, जो जैसे किसी प्राचीन काम-शिल्प का जीवंत उदाहरण था। पढ़ते-पढ़ते न केवल शरीर बल्कि मन भी प्रफुल्लित हो उठेगा।
इस कहानी सुनाने वाले भ्राताश्री हैं, इसलिए मैं के संवाद को उनका समझें।
संध्या का समय था। द्वार खुलते ही श्री अंदर आया और बिना एक शब्द कहे, मेरे अंग-अंग से लिपट गया। उसके उष्ण श्वास मेरी गरदन को स्पर्श कर रहे थे, मानो कोई प्रेम-लता मेरे अस्तित्व को अपनी ओर खींच रही हो।
श्री: (मधुर स्वर में, कान में फुसफुसाते हुए) अंकल... आज तो मैं पहल करना चाहता हूँ। मेरा जवान इच्छाधारी नाग आपकी गहराई को नापना चाहता है। बहुत दिनों से यह प्यास मन में सुलग रही थी।
मैं: (मुस्कुराते हुए) ठीक है वत्स, आज तेरी इच्छा ही मेरी आज्ञा है। तेरी उमंग को मैं संपूर्ण तृप्ति दूँगा।
श्री: (आँखों में शरारत भरे) तेल की महक... और मेरी जीभ की नम यात्रा... आप तैयार तो हैं ना अंकल? मेरे मुख में आप के तने शिश्न को समाहित करने का मन कर रहा है।
मैं: हाँ श्री , सब कुछ तेरे लिए तैयार है।
उसका लौड़ा भी अब पूर्णतः जागृत हो चुका था – लगभग 8 इंच लंबा, 2.5 इंच मोटा, लालिमा लिए टोपी वाला, मानो कोई गुप्त रत्न। झांटों की 1.5 इंच लंबी काली घास उसकी जवान मर्दानगी को और भी आकर्षक बना रही थी।
मैंने बैठते हुए अपना लंड बाहर निकाला। श्री तुरंत मेरे चरणों के समीप घुटनों पर बैठ गया, जैसे कोई भक्त अपने आराध्य की पूजा करने उतरा हो।
श्री: वाह अंकल... आपकी यह महान स्तंभ तो कितना सुदृढ़ और रस से भरा है। पहले मैं इसे रसपान करूँगा।
उसने मुंह खोलकर पूरी टोपी को अपनी गर्माई में समेट लिया और प्रोफेशनल अंदाज में गप-गप्प, चुप-चुप चूसने लगा। उसकी जीभ लंड के नीचे वाले संवेदनशील भाग पर चक्कर काट रही थी, मानो कोई नृत्यांगना अपनी कला दिखा रही हो।
मैं: (साँसें भारी करते) अह्ह... श्री, तेरी कला अद्भुत है। कहाँ से सीख लिया। धीरे-धीरे... मेरे रस को पूर्णतः निकाल ले।
कुछ ही क्षणों में उसके प्रीकम की मीठी बूँदें भी निकलने लगीं।
श्री: (लंड को थोड़ा बाहर निकालकर, आँखें बंद करते) अंकल... मेरा अमृत भी थोड़ा-थोड़ा टपक रहा है। अब आपकी बारी... मैं आपको अपने रस का पान भी करना चाहता हूँ।
मैं: ले, पहिले मेरा पीले जितना मन हो।
उसने मेरे लंड को अपनी मुट्ठी में दबाकर और भी कड़ा किया तथा पूरा मुंह में ले लिया। सिर को आगे-पीछे हिलाते हुए वह इतनी तेजी से चूस रहा था कि मैं पूरे मूड में आ गया।
श्री: (मुंह भरकर, गद्गद स्वर में) म्म्म... अंकल, आपका खारा रस कितना उत्तेजक है। पहले अपने दोस्त का चूसा था, लेकिन आज आपका देखकर मन ललचा गया।
मैं: सच कह रहा है? तेरे उस स्थायी साथी का क्या हाल है?
श्री: (चूसते हुए) हाँ अंकल... उसका हर बार चूसता हूँ। वो तो जल्दबाज़ है, पूरी झड़ी मेरे मुख में बरसा देता है। पता ही नहीं चलता।
थोड़ी देर बाद मैंने उसे ऊपर उठाया।
श्री: अंकल अब मेरी जिह्वा आपके हसीन नितंबों की यात्रा पर निकलना चाहती है। एक वीडियो में देखा था, सोचा आपके साथ प्रयोग करूँ। आपकी पवित्र गांड़ को रस से सिंचित कर दूँगा।
मैं उल्टा लेट गया। श्री ने पहले पानी से साफ किया, फिर अपनी नम्र एवं गर्म जीभ से छेद के चारों ओर घुमाना शुरू किया।
श्री: (चाटते हुए, बीच-बीच में बोलते) अंकल... आपकी यह गुप्त कली कितनी स्वादिष्ट और नाजुक है। जीभ को एक इंच अंदर तक ले जा रहा हूँ... गुदगुदी हो रही है ना? रस की धार बह रही है।
मैं: (कराहते हुए) हाँ... बहुत आनंद आ रहा है पुत्र। और गहराई तक...
लगभग दो मिनट तक वह जीभ घुमाता रहा। उसका अपना लौड़ा पूरी तान पर खड़ा था और ऊर्ध्वाधर नृत्य कर रहा था।
श्री: (चाटकर उठते हुए) अंकल, अब तेल की मालिश? आपकी गहराई अब पूरी तरह तैयार हो चुकी है।
मैं: लगा ले, जितना चाहे।
उसने तेल लेकर अपने मोटे दंड पर अच्छे से पोता, फिर दो उंगलियों से मेरी गांड़ में अंदर तक फैला दिया।
श्री: (भारी स्वर में) अंकल... अब प्रवेश करूँ? आपके कोश को अपनी कुंजी से खोल कर भर दूँ?
मैं: हाँ... पूरा समर्पण ।
उसने टोपी मेरी गांड़ पर रखी और कंधे पकड़कर एक जोरदार धक्का मारा। पूरा लौड़ा एक ही बार में अंदर समा गया।
मैं: आह्ह्ह... धीरे श्री...
श्री: (गहरी साँस लेते) अंकल... आपकी गुफ़ा कितनी गरम है। अब मैं ताल बिठाकर नृत्य शुरू करता हूँ... गपागप... गपागप...
हर धक्के पर उसका पेट मेरी पीठ से टकराता, गरम साँसें गर्दन को छूतीं।
श्री: (चोदते हुए) अंकल... कितना सुख दे रही है आपकी गुफ़ा । बोलिए... तेज ताल चाहिए? मेरे रस की झड़ी लगने वाली है।
मैं: हाँ बेटा... और गहराई तक... पूरी शक्ति से।
कुछ मिनट बाद उसका चरम आया।
श्री: (जोर-जोर से झटके मारते) अंकल... आ रहा हूँ... छर्र... छर्र... मेरे अमृत की धार आपकी गहराई में भर रही है!
वह मेरे ऊपर ढेर हो गया, साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं।
श्री: (चूमते हुए) अंकल... स्वर्ग से भी बेहतर आनंद था। अब आप मेरी गुफ़ा मे प्रवेश कराइए।
अब मेरी बारी थी। मैंने उसकी टी-शर्ट उतारी। उसके चिकने, सफाचट शरीर को देखकर मेरे मन में आग सी लग गई – बाहों के नीचे हल्के बाल, नाभि के आस-पास नरम रोयें। मैंने उसे पूरे शरीर पर चूमना-चाटना शुरू किया – गाल, गर्दन, कोमल चूचियाँ, पेट... सब जगह।
मैं: तेरी यह यौवन-लता तो आग है... हर अंग रस से लबरेज है।
श्री: (सिहरते हुए) अंकल... चूसिए... काटिए... मेरी कोमल कलियाँ आपके लिए ही खिली हैं।
मैंने उसे उल्टा लिटाया, तेल की मालिश की और अपना दंड उसकी गांड़ पर रखा।
मैं: तैयार है मेरे राजकुमार?
श्री: हाँ... लेकिन धीरे शुरू कीजिए, मेरी गुफ़ा अभी नवयुवती ही है।
पहले झटके में आधा घुसा तो वह बिलबिला उठा।
श्री: आह्ह्ह... अंकल... दर्द की मिठास हो रही है...
मैंने और तेल लगाया तथा पूरे जोर से एक झटका मारा। पूरा लौड़ा अंदर समा गया।
श्री: (कराहते हुए) अरे अंकल... पूरा प्रवेश... प्लीज रुकिए...
मैं: बस थोड़ी देर... फिर सुख की बारिश होगी।
फिर शुरू हुई मेरी घपाघप। वह उछल-उछलकर छूटने की कोशिश करता, लेकिन मैंने कसकर पकड़ रखा था।
श्री: (धीरे-धीरे मजा लेते) अंकल... अब मजा आने लगा... आपका मोटा दंड मेरी गहराई को भर रहा है। और तेज कीजिए...
मैं: बोल... मेरे रत्न का सुख मिल रहा है ना?
श्री: हाँ अंकल... पूरी तरह भर गया हूँ।
अंत में मैं भी चरम सुख पर पहुँचा और उसके अंदर अपना पूरा अमृत उड़ेल दिया। निकालते समय थोड़ा खून भी लगा था, जो उसके प्रथम पूर्ण मिलन का प्रमाण था।
मैं: बहुत दर्द हुआ क्या?
श्री: शुरू में बहुत, लेकिन बाद में अमृत जैसा आनंद मिला। मेरा दोस्त भी ऐसे ही दीर्घ समय तक नृत्य करता है... कभी-कभी तो गांड़ चाटते हुए घंटों रस बरसाता रहता है।
कपड़े पहनने से पहले हमने एक-दूसरे को फिर से चूम-चाटा, गले लगाया और दोहरी तृप्ति के साथ विदा किया। दोनों के मन-शरीर पूर्णतः संतुष्ट थे।
इस Gay Sex Stories को पढ़ते हुये मैंने (डॉ कामेश) सारे वस्त्र उतार रखे थे और करीब दो बार परमानंद की अनुभूति की और अपनी मचलते नितंबों का विडियो बनाया।
फ़ोटो भ्राता श्री को भी भेजा और लेखन के लिए बधाई दी। आप सब को भी आनंद आए तो प्रतिक्रिया अवश्य दें!
मुजे ईमेल करे। आप को रिप्लाई अवश्य दूँगा। sns671016@gmail.com

Comments