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सेक्सी पड़ोसन काव्या आंटी को पापा के साथ घपाघप करते देखा: Antarvasna Sex Stories

ये बात उस वक्त की है जब मैं 20 साल का था और कॉलेज के सेकेंड ईयर में पढ़ता था। मेरी ज़िंदगी का ये एक ऐसा किस्सा है जिसे मैंने हमेशा छुपा कर रखा, एक ऐसी सच्ची कहानी जो मेरी यादों के सीने में दफ़न थी लेकिन आज आपके सामने बयां कर रहा हूँ। ये कोई बनावटी सेक्स स्टोरी नहीं है, बल्कि मेरी अपनी आँखों देखी हक़ीकत है जिसने मेरी कामवासना को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया था। हम लोग इंदौर के विजय नगर इलाके में रहते थे, एक साधारण से मिडिल क्लास मोहल्ले में। मेरे पापा, राघवेंद्र सक्सेना, उस वक्त 45 साल के थे, सरकारी दफ़्तर में बड़े अफसर थे, छह फुट का कद, चौड़ी छाती और आवाज़ में एक अजीब सा रुतबा था जो सुनने वाले को झुकने पर मजबूर कर दे। माँ, सुधा सक्सेना, 42 साल की एक सीधी-सादी गृहिणी थीं, हमेशा पूजा-पाठ और घर के कामों में लगी रहती थीं। हमारा परिवार ऊपर से देखने में एकदम परफेक्ट लगता था, लेकिन अंदर ही अंदर कुछ ऐसी दरारें थीं जिनके बारे में मुझे तब तक नहीं पता था।


हमारे बगल वाले घर में शर्मा परिवार रहता था, लेकिन मोहल्ले में सबसे ज़्यादा चर्चा जिस घर की होती थी, वो था ठीक सामने वाला मकान नंबर 47, जहाँ काव्या आंटी अकेली रहती थीं। काव्या आंटी, यानी काव्या मल्होत्रा, 35 साल की एक तलाकशुदा औरत थीं, जिनका पति उन्हें छोड़ कर किसी और के साथ भाग गया था। अब वो अकेली ही अपनी ज़िंदगी जी रही थीं, और जीने का उनका अंदाज़ भी कुछ अलग ही था। मोहल्ले की औरतें उन्हें अच्छी नज़रों से नहीं देखती थीं, लेकिन मर्दों की निगाहें अक्सर उनके घर की तरफ ही लगी रहती थीं। काव्या आंटी की खूबसूरती का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब भी वो अपने घर की बालकनी में आतीं, तो नीचे से गुज़रने वाले ऑटो वाले, सब्ज़ी वाले, यहाँ तक कि स्कूल जाते लड़के भी ठिठक कर ऊपर देखने लगते थे। उनका रंग एकदम दूधिया गोरा था, बाल घने, काले और लहराते हुए जो उनकी कमर तक आते थे। आँखें बड़ी-बड़ी, गहरी भूरी, जिनमें हमेशा एक शरारती चमक रहती थी। होंठ गुलाबी और फूले हुए, जैसे हमेशा किसी को चूमने के लिए तैयार हों। लेकिन उनकी सबसे बड़ी खासियत थी उनका बदन, जिसे देख कर कोई भी मर्द अपनी नज़रें नहीं हटा सकता था।


काव्या आंटी का बदन देख कर लगता था जैसे किसी ने बहुत हिसाब से गढ़ा हो। उनकी हाइट करीब पाँच फुट छह इंच थी, और उनका फिगर ऐसा था कि किसी भी 20 साल की लड़की को शर्मिंदा कर दे। उनके स्तन, हे भगवान, उनके स्तनों के बारे में सोच कर ही मेरे दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती थीं। वो 38D साइज़ के रहे होंगे, हमेशा तने हुए और उभरे हुए, जैसे किसी भी वक्त उनकी ब्लाउज़ को चीर कर बाहर आ जाएंगे। उनकी कमर इतनी पतली थी कि एक हाथ में समा जाए, और उसके नीचे कूल्हों का फैलाव ऐसा कि चलते वक्त उनका लहराना सीधे दिमाग में नशा भर देता था। उनके पैर लंबे, सुडौल और जाँघें ऐसी गोल-मटोल कि जब वो साड़ी पहनतीं तो साड़ी का पल्लू हर कदम पर उनकी जाँघों से सरकता रहता। और जब वो चूड़ीदार पहनतीं, तो उनका पिछवाड़ा, जो एकदम गोल और उभरा हुआ था, सबकी नज़रों का केंद्र बन जाता। मैं खुद कितनी बार अपनी छत पर जा कर इस बात का बहाना बनाता कि पतंग उड़ा रहा हूँ, लेकिन असल में मेरी नज़रें सिर्फ और सिर्फ काव्या आंटी की छत पर टंगी उनकी धुली हुई ब्रा और पैंटी पर होती थीं। उनके अंडरगारमेंट्स का साइज़ देख कर मेरी साँसे रुक जाती थीं। उनकी ब्रा के कप इतने बड़े थे कि मेरा पूरा चेहरा उनमें समा जाए, और उनकी पैंटी का फीता इतना पतला होता था कि वो उनकी गांड की दरार में कहीं खो सा जाता।


मोहल्ले में काव्या आंटी के किरदार को लेकर कई तरह की बातें फैली हुई थीं। कुछ कहते थे कि वो किसी बड़े बिज़नेसमैन की रखैल हैं, तो कुछ कहते कि उन्होंने अपने पति को इसलिए भगा दिया क्योंकि उनकी भूख सिर्फ एक मर्द से नहीं मिटती थी। लेकिन मुझे इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। मेरे लिए तो वो सिर्फ एक जीती-जागती हसीना थीं, जिनके बारे में सोच कर मैं रात भर अपने बिस्तर में करवटें बदलता रहता। मैं अक्सर अपने कमरे की खिड़की से झाँक कर उनके घर को देखता रहता, इस उम्मीद में कि शायद वो अपने कमरे की खिड़की पर आएँ और मुझे एक झलक दिखा दें। कई बार ऐसा होता भी। गर्मियों की रातों में जब बिजली चली जाती, तो काव्या आंटी अक्सर अपने बरामदे में एक चारपाई डाल कर लेट जातीं, सिर्फ एक पतली सी नाइटी में। मैं छत पर जा कर लेट जाता और नीचे झाँक कर उन्हें देखता रहता। अँधेरे में भी उनके गोरे बदन की चमक साफ दिखाई देती थी। उनकी नाइटी पसीने से भीग कर उनके बदन से ऐसे चिपक जाती जैसे दूसरी त्वचा हो। उनके स्तनों के उभार, निप्पलों की कठोरता, जाँघों का आपस में रगड़ खाना, ये सब मुझे पागल कर देता। मैं बस यही सोचता रहता कि काश एक बार मैं उनके उस बदन को हक़ीकत में छू पाता, उनके साथ वो सब कर पाता जो मैंने सिर्फ इंटरनेट की सेक्स स्टोरी में पढ़ा था। लेकिन मुझे नहीं पता था कि जल्द ही मेरी ये अंतर्वासना एक ऐसे मोड़ पर पहुँचने वाली थी जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।


उन दिनों मेरे घर का माहौल कुछ अजीब सा चल रहा था। पापा ऑफिस से देर से आते, माँ से बहुत कम बात करते, और अक्सर अपने मोबाइल में ही लगे रहते। माँ भी कुछ उदास सी रहने लगी थीं, लेकिन मुझसे कभी कुछ नहीं कहती थीं। मुझे लगता था कि शायद ऑफिस का तनाव होगा। पापा हमेशा से ही एक सख्त मिजाज़ के इंसान थे, लेकिन पिछले कुछ महीनों से उनके व्यवहार में एक अजीब सी चंचलता भी आ गई थी, जैसे वो अंदर ही अंदर किसी बात को लेकर बहुत खुश हों। वो अपनी डाइट का ज़्यादा ख्याल रखने लगे थे, रोज़ सुबह जॉगिंग पर जाते, और नए-नए कपड़े खरीदते। माँ से तो उनका व्यवहार रूखा ही था, लेकिन बाहर वालों से, खास कर काव्या आंटी से, उनका व्यवहार बहुत ही दोस्ताना हो गया था। मैंने कई बार देखा कि पापा और काव्या आंटी सुबह-सुबह पार्क में साथ-साथ टहलते नज़र आते। मुझे ये थोड़ा अजीब तो लगा, लेकिन मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया। मेरा अपना ध्यान तो बस काव्या आंटी के उभरते हुए जिस्म पर ही टिका रहता था। पार्क में जब वो ट्रैक सूट पहन कर एक्सरसाइज़ करतीं, तो उनके स्तनों की हरकत देख कर लगता था कि अब गिरे, तब गिरे। उनकी टाइट टी-शर्ट पर पसीने के धब्बे उनके निप्पलों के ठीक ऊपर बनते, जो मुझे पूरी तरह से बेकाबू कर देते थे।


एक दिन की बात है, माँ अपनी बहन के घर नागपुर गई हुई थीं। वहाँ किसी रिश्तेदार की शादी थी और माँ को एक हफ्ते के लिए जाना था। पापा को ऑफिस की वजह से रुकना पड़ा, और मुझे भी कॉलेज की वजह से घर पर ही रहना था। माँ के जाने के बाद घर बिल्कुल सूना सूना लग रहा था। पापा सुबह से शाम तक ऑफिस में रहते, और मैं अपने दोस्तों के साथ वक्त बिताता। लेकिन माँ के जाने के तीसरे दिन मेरा कॉलेज में एक प्रैक्टिकल एग्ज़ाम जल्दी खत्म हो गया और मैं दोपहर के करीब एक बजे ही घर वापस आ गया। मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा कि अंदर से चाबी लगी हुई थी, मतलब पापा अंदर ही हैं। मुझे हैरानी हुई क्योंकि पापा आमतौर पर इस वक्त घर पर नहीं होते थे। मैंने अपनी चाबी से दरवाज़ा खोला और अंदर दाखिल हुआ। ड्रॉइंग रूम में कोई नहीं था, लेकिन फर्श पर दो जोड़ी चप्पलें रखी थीं। एक पापा की और एक औरतों वाली सैंडिल। मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मैंने धीरे से अपने जूते उतारे और दबे पाँव अंदर की तरफ बढ़ने लगा।


जैसे-जैसे मैं बेडरूम के पास पहुँचा, मुझे कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई देने लगीं। किसी औरत की दबी हुई हँसी, फिर एक लंबी सी सिसकारी, और फिर एक गहरी, भारी साँस। मेरे पैर अपने आप ही रुक गए। मैंने खुद को संभाला और धीरे से दरवाज़े के पास जा कर खड़ा हो गया। बेडरूम का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला हुआ था, बस इतना कि अंदर का नज़ारा साफ दिखाई दे। मैंने अंदर झाँका और जो देखा वो आज भी मेरी आँखों के सामने से नहीं जाता। बिस्तर पर मेरे पापा, राघवेंद्र सक्सेना, नंगे बदन लेटे हुए थे, और उनके ऊपर सवार थीं हमारी सेक्सी पड़ोसन, काव्या आंटी। मेरी साँसे रुक गईं, दिल की धड़कनें इतनी तेज़ कि लगा बाहर तक आवाज़ जाएगी, लेकिन मैं हिल भी नहीं पाया। मेरी आँखों के सामने वो सीन था जिसके बारे में मैंने हज़ारों बार कल्पना की थी, लेकिन हक़ीकत में ये सब मेरे अपने पापा के साथ हो रहा था।


काव्या आंटी की पीठ दरवाज़े की तरफ थी और वो बिल्कुल नंगी थीं। मैंने उनका वो बदन पहली बार इतनी करीब से, इतनी सफाई से देखा था। उनकी पीठ का हल्का सा कर्व, कमर का पतलापन और नीचे कूल्हों का जबरदस्त फैलाव, सब कुछ बेहद कामुक लग रहा था। वो पापा के ऊपर उल्टी काउगर्ल पोज़ीशन में बैठी थीं, उनकी गांड की गोलाइयाँ साफ उभर कर सामने आ रही थीं, और उन गोलाइयों के बीच में पापा का लंड गायब था। मेरे पापा का लंड, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था, वो काव्या आंटी की चुत में पूरी तरह से धँसा हुआ था। काव्या आंटी अपनी कमर को गोल-गोल घुमा रही थीं, और हर घुमाव के साथ एक गीली सी, चिपचिपी आवाज़ आती, जो साफ बता रही थी कि अंदर कितना रस भरा हुआ है। उनका बदन पसीने से भीगा हुआ था, और कमरे में सिर्फ उन दोनों की भारी-भारी साँसों की आवाज़ें गूँज रही थीं। पापा के हाथ काव्या आंटी के कूल्हों पर जमे हुए थे, और वो उन्हें ऊपर-नीचे करने में मदद कर रहे थे।


काव्या आंटी ने अपनी गर्दन पीछे की तरफ झुकाई और ज़ोर से आवाज़ निकाली, |आआआह्ह्ह्ह्ह… राघव… तुम्हारा लौड़ा तो कमाल का है… इतना मोटा और गरम… मेरी चुत भर गई है इससे…| मेरे पूरे शरीर में एक कंपकंपी दौड़ गई। जिस औरत के बारे में मैं रोज़ हस्तमैथुन करता था, जिसकी पैंटी सूँघने की मैं ख्वाहिश रखता था, वो मेरे ही पापा के लंड पर उछल रही थी। पापा ने भी एक गहरी गुर्राहट के साथ अपनी कमर ऊपर की तरफ उठाई, जिससे उनका लंड काव्या आंटी की चुत में और गहरा धँस गया। उन्होंने जवाब दिया, |काव्या… तेरी चुत भी तो कमाल की है… इतनी गरम और चुस्त… जब से तुझे देखा है, सुधा को तो हाथ तक नहीं लगाया…| ये सुन कर मुझे अपनी माँ पर गुस्सा और पापा पर अजीब सी ईर्ष्या हुई, लेकिन साथ ही एक उत्तेजना भी जो मेरे अपने लंड को तन कर खड़ा कर रही थी। मैंने देखा कि काव्या आंटी ने अपनी रफ्तार और तेज़ कर दी। वो अब अपने कूल्हों को ज़ोर-ज़ोर से पटक रही थीं, उनकी गांड की मांसल गोलाइयाँ तेज़ी से हिल रही थीं और हर बार जब वो नीचे बैठतीं, तो पापा का लंड उनकी चुत की गहराई में कहीं खो जाता।


मैं दरवाज़े के पीछे खड़ा अपनी हालत पर काबू नहीं रख पा रहा था। मैंने धीरे से अपनी पैंट की ज़िप खोली और अपना कड़ा हुआ लंड बाहर निकाल कर सहलाने लगा। उस वक्त मुझे किसी बात की शर्म नहीं आ रही थी, सिर्फ एक जानवर सी भूख थी जो मेरी आँखों के सामने के नज़ारे से भड़क गई थी। तभी काव्या आंटी ने अपनी पोज़ीशन बदली। वो पापा के ऊपर से उतरीं और उनकी तरफ मुड़ कर बैठ गईं। अब वो मेरी तरफ फेस कर रही थीं और मैंने पहली बार उनके वो स्तन देखे, जिनकी दीवानगी में मैं रातों को सो नहीं पाता था। हे भगवान, वो उससे कहीं ज़्यादा बड़े और खूबसूरत थे जितना मैंने सोचा था। गोरे पहाड़ों पर हल्की नीली नसें दिख रही थीं, निप्पल गहरे भूरे और इतने कड़े कि लग रहा था किसी ने लोहे की गोलियाँ चिपका दी हों। काव्या आंटी ने झुक कर पापा का लंड अपने हाथ में लिया। मैंने पापा के लंड को पहली बार इतने करीब से देखा। वो काफी मोटा और लंबा था, कम से कम साढ़े सात इंच का होगा, और उसका सिरा गहरे लाल रंग का था, जिस पर से काव्या आंटी की चुत का रस चमक रहा था।


काव्या आंटी ने पापा के लंड के सिरे को अपने होंठों से छुआ और फिर धीरे-धीरे उसे अपने मुँह में लेने लगीं। पापा ने एक लंबी सिसकारी भरी, |आआह्ह्ह्ह… काव्या… तू तो सच में चुदक्कड़ है… कितनी अच्छी तरह चूसती है…| काव्या आंटी ने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि अपनी रफ्तार और बढ़ा दी। उनका मुँह अब पूरी तरह से पापा के लंड पर चढ़ रहा था, और उनके गाल अंदर-बाहर हो रहे थे। मुझे लग रहा था कि पापा का पूरा लंड शायद उनके गले से बाहर आ जाएगा। उनके एक हाथ से पापा के गोटे सहला रही थीं और दूसरे हाथ से अपनी चुत। मैंने देखा कि काव्या आंटी की चुत से रस टपक कर बिस्तर की चादर पर गिर रहा है। उनकी अंगुलियाँ तेज़ी से अपनी चुत के भीतर आ-जा रही थीं और वो मुँह से लगातार पापा का लंड चूस रही थीं। अचानक पापा ने अपनी कमर ऊपर उठाई और काव्या आंटी के मुँह में ज़ोर से झटका मारा। काव्या आंटी की आँखें बाहर निकल आईं लेकिन उन्होंने खुद को नहीं छुड़ाया, बल्कि और ज़ोर से चूसने लगीं।


पापा फिर उठ बैठे और उन्होंने काव्या आंटी को बिस्तर पर लिटा दिया। अब काव्या आंटी मेरी तरफ पैर फैलाए पीठ के बल लेटी थीं, और पापा उनके ऊपर झुके हुए थे। ये नज़ारा एकदम साफ था, क्योंकि दरवाज़ा सीधा बिस्तर के सामने ही था। पापा ने अपना लंड एक बार फिर काव्या आंटी की चुत पर रगड़ा, जिससे एक चिपचिपी आवाज़ आई, और फिर एक झटके में पूरा अंदर डाल दिया। काव्या आंटी चीख पड़ीं, |उउउह्ह्ह्ह्ह… राघव… धीरे… आज तो बहुत गर्मी है…| लेकिन पापा नहीं रुके। वो मिशनरी पोज़ीशन में बड़ी ही बेरहमी से चोद रहे थे। उनके कूल्हे बिजली की तरह तेज़ी से आगे-पीछे हो रहे थे, और हर वार के साथ काव्या आंटी के स्तन ज़ोर से हिलते और उछलते। पापा ने झुक कर काव्या आंटी के एक निप्पल को मुँह में ले लिया और दूसरे को अपनी अंगुलियों से मसलने लगे। काव्या आंटी का बदन मछली की तरह तड़प रहा था। उनकी टाँगें पापा की कमर से लिपटी हुई थीं और उनके नाखून पापा की पीठ में गड़ गए थे।


पापा ने फिर अपनी गति बदली। वो अब धीरे-धीरे, लेकिन गहराई तक जा कर वार कर रहे थे। हर बार जब वो अपना लंड बाहर निकालते, तो सिर्फ सिरा काव्या आंटी की चुत के होंठों पर रहता, और फिर पूरी ताकत से अंदर घुसा देते। ये देख कर मेरे अपने लंड में एक अजीब सी ऐंठन उठ रही थी। पापा ने काव्या आंटी के पैरों को उनके कंधों पर रख लिया, जिससे उनकी चुत और भी खुल कर सामने आ गई। मैंने देखा कि काव्या आंटी की चुत के होंठ गहरे गुलाबी रंग के थे, और उन पर पापा के पिछले वार का सफेद रस चिपका हुआ था। पापा का लंड अब एक मशीन की तरह उस चुत में चल रहा था, और कमरे में सिर्फ दो आवाज़ें थीं, एक लगातार गीली चुदाई की आवाज़ और दूसरी काव्या आंटी की बेकाबू सिसकारियाँ, |उह्ह्ह्ह… आआअह्ह्ह्हह… और ज़ोर से… और गहरा… मेरी चुत फाड़ दो… आआह्ह्ह्ह…|


करीब पंद्रह मिनट की इस ज़बरदस्त चुदाई के बाद, पापा ने अपना लंड काव्या आंटी की चुत से बाहर निकाल लिया। उनका लंड एकदम चमक रहा था, पूरी तरह से काव्या आंटी के रस में भीगा हुआ। पापा हाँफ रहे थे लेकिन उनकी आँखों में अभी भी वही भूख थी। उन्होंने काव्या आंटी को पलट कर कुत्ते की तरह हाथों और घुटनों पर खड़ा कर दिया। डॉगी स्टाइल में काव्या आंटी का शरीर और भी कामुक लग रहा था। उनकी कमर का पतलापन और उसके नीचे गांड का विशाल फैलाव, एकदम दिलकश था। पापा उनके पीछे घुटनों के बल बैठ गए और उन्होंने अपने लंड को काव्या आंटी की चुत के सामने लगाया। इस बार उन्होंने एक ही झटके में अपना पूरा लंड अंदर घुसा दिया। काव्या आंटी ज़ोर से चीखीं, |आआअह्ह्ह्ह्हह… राघव… बहुत गहरा चोद रहे हो… मेरी तो चुत फट जाएगी…| लेकिन उनकी इस चीख में दर्द नहीं, बल्कि एक पागलपन भरा आनंद था। पापा ने उनके कूल्हों को कस कर पकड़ लिया और तेज़ी से चोदने लगे। उनके पेट के काव्या आंटी की गांड से टकराने की आवाज़ें तेज़ होती जा रही थीं। पापा का पसीना टपक कर काव्या आंटी की पीठ पर गिर रहा था, और उनकी पीठ के नीचे पसीने की एक पतली धार बह कर उनकी गांड की दरार में समा रही थी।


इस पोज़ीशन में पापा का लंड और भी गहराई तक जा रहा था, और काव्या आंटी बार-बार अपनी कमर पीछे कर रही थीं ताकि हर इंच अंदर जा सके। उनके स्तन तेज़ी से आगे-पीछे झूल रहे थे, और मैं देख सकता था कि उनके निप्पल बिस्तर की चादर से रगड़ खा रहे थे। काव्या आंटी ने अपना एक हाथ पीछे ले जा कर पापा के गोटे सहलाने शुरू कर दिए, और दूसरे हाथ से अपनी चुत की क्लिटोरिस रगड़ने लगीं। वो इस कदर खोई हुई थीं कि उन्हें अपने आस-पास की कोई होश नहीं थी। पापा भी अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच रहे थे। उनकी साँसें तेज़ हो गई थीं और उनकी आँखें बंद थीं। उन्होंने अपनी रफ्तार और भी तेज़ कर दी, इतनी तेज़ कि बिस्तर की चरमराहट बढ़ गई।


अचानक पापा ने एक ज़ोरदार दहाड़ लगाई, |आआआआअह्ह्ह्ह्ह… काव्या… ले… अब ले… मैं झड़ रहा हूँ…| और उन्होंने अपना लंड काव्या आंटी की चुत से बाहर निकाल कर तेज़ी से हिलाना शुरू कर दिया। मैंने देखा कि पापा के लंड के सिरे से सफेद रस की मोटी-मोटी धारें निकल कर काव्या आंटी की पीठ और गांड पर गिरने लगीं। एक, दो, तीन… पूरी पाँच ज़ोरदार फुहारें निकलीं और काव्या आंटी की पीठ सफेदी से पट गई। काव्या आंटी भी इसी दौरान अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थीं। उनकी चुत से भी रस की एक बाढ़ सी आई और उनकी जाँघें काँपने लगीं। वो ज़ोर-ज़ोर से सिसकारियाँ भर रही थीं, |आआआ… मैं भी आ रही हूँ… राघव… मेरी चुत… उह्ह्ह्ह…| पूरा बेडरूम सेक्स की भीनी-भीनी खुशबू से भर गया था और उन दोनों के बदन पसीने और रस में एक-दूसरे से ऐसे लिपटे हुए थे मानों वो अभी भी एक हों।


कुछ देर तक तो दोनों वैसे ही निढाल पड़े रहे। मैं भी दरवाज़े के पीछे से अपना वीर्य पोंछ कर चुपचाप खड़ा था, हैरान और स्तब्ध। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। क्या मैं अंदर जा कर उन्हें बेनकाब करूँ? नहीं, ये तो बेवकूफी होती। मेरे मन में अब भी सिर्फ और सिर्फ वासना थी। मैं तो बस यही चाहता था कि काश पापा की जगह मैं होता, लेकिन साथ ही ये सीन मेरे लिए एक ऐसा खज़ाना बन चुका था जिसे मैं बार-बार अपनी यादों में दोहराना चाहता था। मैं धीरे से पीछे हटा और अपने कमरे में जा कर लेट गया। मेरे दिमाग में बस काव्या आंटी के नंगे बदन की तस्वीर घूम रही थी और मेरे कानों में उनकी चुदाई की आवाज़ें गूँज रही थीं। ये मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और सबसे गुप्त राज़ था, एक सच्ची सेक्स स्टोरी जिसने मेरी अंतर्वासना को एक नई दिशा दे दी थी। कौन जानता था कि मेरी अपनी पड़ोसन, जिसके लिए मैं पागल था, वो मेरे ही पापा के लंड की दीवानी निकलेगी, और ये सब मैं अपनी आँखों से देखूंगा।

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