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ट्रेन में श्रद्धा बनी रंडी - Free Sex Kahani

मेरी कहानी - मैं हूँ श्रद्धा, एक शादीशुदा और हमेशा लंड की भूखी रांड।


मेरा शरीर, मेरी भूख मेरा नाम श्रद्धा है। मैं ३२ साल की हूँ। मेरे पति का नाम विनय है, वो ३४ के हैं।


मैं गोरखपुर से मुंबई ट्रेन से जा रही थी अपने पति के साथ। ३६ घंटे का सफर था, रात १० बजे ट्रेन थी। पहले मैं अपने शरीर के बारे में बताती हूँ। मैं लंबी नहीं हूँ, लगभग ५ फुट ३ इंच। मेरा रंग गोरा है, गेहूँ जैसा। मेरे बाल काले लंबे हैं, कमर तक आते हैं।


मेरा चेहरा गोल है, बड़ी-बड़ी काली आँखें, जिनमें हमेशा एक शैतानी चमक रहती है। होंठ मोटे और गुलाबी हैं। मेरी गर्दन लंबी और सुडौल है। मेरे बूब्स बड़े हैं - ३४ डी कप। बिल्कुल सफेद और उभरे हुए, दूध से भरे तरबूज की तरह। उन पर गुलाबी निप्पल हैं, जो जरा सी छूने पर कड़े हो जाते हैं। मेरी कमर पतली है, २६ इंच।


मेरे कूल्हे चौड़े हैं, जैसे बच्चे जनने वाली औरत के होते हैं। मेरी चूत - उसका तो कोई जवाब नहीं। गुलाबी, मुलायम, बिल्कुल बाल रहित क्योंकि मैं हमेशा वैक्स करवाती हूँ। चूत के होंठ थोड़े मोटे हैं, भीतर की तरफ लाल रसीले कत्थई रंग के। मेरी चूत का दाना - क्लिटोरिस - बाहर निकला हुआ है बिल्कुल छोटी उँगली की नोक जितना, हमेशा चुभने को तैयार। मेरी गांड - वो भी देखने लायक है।


दो गोल गद्देदार चूतड़, बर्फ की तरह सफेद, जिनके बीच में काली-गुलाबी गुदा छिपी है, छोटी और कसी हुई, जैसे किसी ने कभी न छुआ हो। मेरी चूत हमेशा गीली रहती है। शायद मैं जन्म से ही रांड हूँ। विनय का लंड सिर्फ ४ इंच का है - मोटा भी नहीं, पतला सा।


लेकिन मैं उससे प्यार करती हूँ। उसने मुझे कभी निराश नहीं किया, लेकिन मुझे पता है मेरी चूत और मेरी गांड बड़ी चीज माँगती है। लेकिन उस दिन मैं सिर्फ अपने पति के साथ रहना चाहती थी। हमने सोचा था कि हमें फर्स्ट क्लास में कूपे मिलेगा - सिर्फ दो लोगों का डिब्बा। तभी तो मैंने ऐसे कपड़े पहने। मैंने बहुत छोटे नीले जींस के शॉर्ट्स पहने - इतने छोटे कि जब मैं बैठती तो मेरे चूतड़ का निचला हिस्सा बाहर झाँकता।


ऊपर बहुत टाइट टी-शर्ट पहनी - सफेद, इतनी टाइट कि मेरे दोनों बूब्स साफ दिखते, उनकी उभार और निप्पल के निशान। मैंने कोई ब्रा नहीं पहनी। मैं चाहती थी विनय पूरे रास्ते मुझे नोचे-खाए। उसका छोटा सा ४ इंच का लंड मेरी गीली चूत में घुसे, मैं उसे चूसूँ, वो मेरे बूब्स चूसे, हम एक-दूसरे में खो जाएँ। ट्रेन में चढ़ने से पहले ही मेरी चूत गीली हो गई थी।


मैं बस यही सोच रही थी - कैसे हम कूपे में निजता पाएँगे, कैसे मैं अपने पति की गोद में बैठुँगी, कैसे मैं उसे मारवाऊँगी, कैसे मैं उसके छोटे से लंड को अपनी चूत में छिपाऊँगी। मेरी चूत से रस टपक रहा था, मेरे शॉर्ट्स पर गीला दाग लग गया था।


विनय ने देखा तो मुस्कुराया और धीरे से फुसफुसाया - "इतनी भूखी है रांड ?" मैंने उसे आँख मारी।


हम स्टेशन पहुँचे। टिकट चेक किया। और फिर वही हुआ जिसकी हमें डर थी। हमें कूपे नहीं मिला। हमें कैबिन मिला - चार लोगों का डिब्बा। मेरा चेहरा उतर गया। विनय का भी। हम दोनों उदास हो गए। मैंने कहा - "अब सब खराब हो गया।"


लेकिन विनय बोला - "कोई बात नहीं। ट्रेन में तो सेक्स होगा ही। हम कोई रास्ता निकाल लेंगे। हम मौका देखेंगे।" हम कैबिन में घुसे। नीचे की दो सीटें हमारी थीं - मेरी और विनय की। ऊपर की दोनों बर्थ खाली थीं। मैंने सोचा शायद ये खाली ही रहें, फिर तो हम चैन से चुदेंगे। मैंने दिल में एक उम्मीद पाल ली।


ट्रेन चल पड़ी। रात के दस बज रहे थे। में विनय के पास आकर बैठ गई। डिब्बे का दरवाजा बंद था। हम अकेले थे। मैंने चुपके से अपनी टी-शर्ट उतार दी। सामने नंगी हो गई। मेरे बूब्स बाहर आ गए, दोनों उभरे हुए, निप्पल कड़े। विनय ने एक बूब्स पर हाथ रखा और धीरे-धीरे दबाने लगा। मैंने मुँह खोला और उसके होंठों पर होंठ रख दिए। हम चूमने लगे।


उसने मेरी जीभ अपने मुँह में खींच ली और चूसने लगा। बड़ी देर तक हम चूमते रहे। फिर मैंने अपने शॉर्ट्स उतार दिए। उनके नीचे कुछ नहीं था - मैं बिल्कुल नंगी थी। मेरी चूत पूरी खुली हुई।


अँधेरे में भी चमक रही थी गीली होने की वजह से। विनय ने अपनी उँगली मेरी चूत के होंठों पर फेरी। मैं सिहर गई। वह धीरे-धीरे मेरी चूत के ऊपरी सिरे पर, जहाँ वो छोटा सा दाना (क्लिट) है, उसे सहलाने लगा। मेरे पैरों में कम्पन हुआ। वह उँगली से घेरा बनाकर घुमा रहा था, कभी दबाकर, कभी हल्के से मसलकर। मैं कराहने लगी। मेरी चूत से पानी बहने लगा।


मैंने दोनों पैर फैला दिए और अँधेरे में बिस्तर पर लेट गई। उसने मेरी चूत पर अपना मुँह रख दिया। उसकी जीभ मेरी चूत में घुस गई। वह चूत चाटने लगा - ऊपर से नीचे, दायें-बाएँ, फिर क्लिट पर जोर से दबाकर चाटना। मैंने दोनों हाथों से अपने बूब्स दबाये और मुँह खोलकर जोर से कराही - "हाँ...और चाट मेरी रांड की चूत...और गीली कर...मैं तेरी कुतिया हूँ...चाट मेरी गांड भी..." उसने मुझे उल्टा कर दिया।


अब मेरी गांड उसके सामने थी। उसने पहले मेरे चूतड़ कौर - दोनों गोल सफेद चूतड़, जो रोशनी में चमक रहे थे - उनमें अपना नाखून फसाया। फिर वह मेरी गांड की दरार में जीभ घुसाने लगा। मेरे गुदा पर जीभ लगी तो मैंने जोर से हिचकी ली। वह चाटता रहा, कभी चूसता रहा। मेरी पूरी गांड गीली हो गई उसकी लार और मेरे रस से।


हम इतने मश्गूल थे कि हमें पता ही नहीं चला कि ट्रेन किसी स्टेशन पर रुक गई है। अचानक दरवाजे पर खट-खट-खट हुई। किसी ने जोर-जोर से दस्तक दी। मैं घबरा गई। विनय भी।


हमने झटपट कपड़े पहने। मैंने शॉर्ट्स पहना, टी-शर्ट पहनी। विनय ने पैंट और शर्ट। दरवाजा खोला। सामने दो आदमी खड़े थे। दोनों मुसलमान लग रहे थे - लगभग ४५-४६ साल के।


एक का नाम रहीम था और दूसरे का अकरम। रहीम लंबा दुबला-पतला था, दाढ़ी रखे, काले कुर्ता-पाजामा पहने। अकरम मोटा नाटा था, गंजा, उसने भी लंबा कुर्ता पहना था। दोनों के हाथों में बिस्तर-बैग थे। उनकी बर्थ ऊपर की थी। मेरा दिल बैठ गया। विनय का भी।


हम निराश हो गए। वे दोनों अंदर आ गए। उन्होंने हमें बुरी नजरों से देखा - खासकर रहीम ने मेरे शरीर पर लंबी नजर डाली। मुझे एक अजीब-सी घबराहट हुई। मेरा चेहरा गुलाबी था, होठों पर लार-चूत का पानी लगा था। शायद मेरे कपड़े अभी भी अस्त-व्यस्त थे। मैं कुछ देर चुपचाप अपनी सीट पर बैठी रही।


रहीम और अकरम ऊपर चढ़ गए थे, अपने बिस्तर बिछा रहे थे। मैंने विनय की तरफ देखा, उसने इशारा किया - टॉयलेट के पास चलो। हम दोनों उठकर बाहर गलियारे में आ गए। टॉयलेट के पास एक छोटी सी जगह थी। वहाँ कोई नहीं था। रात का समय था, गाड़ी तेज दौड़ रही थी। मुझे लगा कि हम अपना काम कर सकते हैं।


विनय ने मुझे दीवार से लगाकर खड़ा किया और फिर से मुझे चूमने लगा। मैंने उसके पैंट का बटन खोला। उसका लंड बाहर निकल आया - सिर्फ ४ इंच का, पतला, लेकिन खड़ा हुआ, गुलाबी और जोर से उठा हुआ। मैंने उसे अपने हाथों में लेकर सहलाना शुरू किया। फिर अपने शॉर्ट्स के अंदर हाथ डाला और अपनी चूत को गीला किया। मैंने उसके लंड को अपनी चूत के ऊपर घिसना शुरू किया। मेरी चूत का दाना उसके सिरे से रगड़ खा रहा था, मैं कराह रही थी, मेरी साँसें तेज हो गईं। "आजा अंदर डाल दे..." मैंने फुसफुसाया।


लेकिन उसी वक्त सामने से किसी के घरघराने की आवाज आई। रहीम टॉयलेट की तरफ आ रहा था। वह हमसे २-३ कदम की दूरी पर खड़ा होकर जोर-जोर से खाँसने लगा - "अह...अह...अहेम..." इस तरह कि जैसे जानबूझकर खाँस रहा हो। मैं शर्म से लाल हो गई। हम वहीं खड़े रहे, मैंने अपना हाथ शॉर्ट्स से बाहर निकाल लिया। विनय का हाथ मेरे बूब्स पर था, उसने भी हटा लिया। रहीम ने मुस्कुराते हुए हमें देखा और फिर टॉयलेट के अंदर चला गया। हम वहाँ से भागकर वापस डिब्बे में आ गए।


विनय ने मुझसे कहा - "मुझे टॉयलेट जाना है, तू पहले अंदर जाकर बैठ। मैं आता हूँ।" मैं डिब्बे में अंदर गई। दरवाजे के पास खड़ी होकर मैंने रहीम और अकरम को आपस में फुसफुसाते सुना। मैं ध्यान से सुनती रही। रहीम बोल रहा था - "बहुत मस्त माल है साली। देख ना कैसी गद्दा रांड बनी फिरती है। छोटी-छोटी शॉर्ट्स में चूत दिखाती है, टाइट टी-शर्ट में बूब्स तराशती है।


अभी देखो टॉयलेट के पास अपनी चूत में हाथ डाल रही थी, पति का लंड ले रही थी। मेरा तो खड़ा हो गया बेटा। काश...काश ये हमारे हाथ लग जाए...चोदें इस रांड को पूरी रात..." अकरम ने कहा - "चुप रह। देखा जाएगा।" मैं डर गई और अंदर घुसकर अपनी सीट पर जाकर बैठ गई। कुछ देर में विनय आया।


वह टॉयलेट से आ रहा था, लेकिन उसके चेहरे से लग रहा था वह अपने लंड को हिलाकर आया था - बिना मुझे चोदे ही निकल आया। मैं समझ गई - वह अपना मर्दाना पानी खुद गिराकर आया है। मेरी चूत भूखी रह गई। मैंने उससे पूछा - "हिलाकर आए?" उसने शर्म से सिर हिलाया। मेरे मुँह से निकला - "बेकार मर्द। मैं तो तरस गई।"


रात गहरी हो गई। १२ बज चुके थे। मैंने देखा रहीम और अकरम दोनों सो गए। उनकी जोर-जोर से खर्राटे आ रहे थे। मैंने विनय को इशारा किया। वह समझ गया। हम दोनों धीरे-धीरे उठे। मैं उसकी बर्थ पर चली गई - नीचे वाली सीट पर। विनय मेरी बर्थ पर आ गया। मैंने धीरे से कपड़े उतारे - पहले शॉर्ट्स, फिर टी-शर्ट। मैं बिल्कुल नंगी हो गई।


अँधेरे में मेरा चेहरा, मेरे बूब्स, मेरी चूत, मेरी गांड - सब कुछ चमक रहा था रोशनी की झलक में। विनय ने मेरी चूत पर फिर से अपना हाथ रखा। उसने दो उँगलियाँ मेरी चूत के भीतर डाल दीं। वह धीरे-धीरे घुमाने लगा, फिर निकालता, फिर डालता। मैं उसके कान के पास मुँह लगाकर कराह रही थी - "और गहरे डाल...मेरी चूत भूखी है...तेरे लंड की भूखी है...लेकिन तेरा लंड तो छोटा है...उँगली ही सही...बस मचा दे मुझे..." उसने अपना मुँह मेरे बूब्स पर रखा।


दूध की तरह सफेद निप्पल को मुँह में भरकर चूसने लगा, जोर से खींचता, जैसे दूध निकाल रहा हो। मैं काँप रही थी, पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई। फिर उसने मेरी चूत पर मुँह रखा और फिर से चाटने लगा - चूत के दाने को, होठों को, भीतर तक। उसकी जीभ अंदर जा रही थी, बाहर आ रही थी। मैं अपने नाखून उसकी पीठ में गड़ा रही थी।


"मुझे चोद...अब चोद...अपना लंड निकाल और डाल दे मेरी चूत में..." मैंने पागलों की तरह कहा। उसने अपना लंड निकाला - छोटा सा, लेकिन जोर से खड़ा। उसे मेरी चूत के दरवाजे पर रखा। वह अंदर घुसने वाला था कि अचानक... पूरे डिब्बे की लाइट जल गई। एकदम उजाला हो गया जैसे दिन हो। मैं चीख पड़ी।


विनय भी चिल्लाया। ऊपर से दो सिर झाँक रहे थे - रहीम और अकरम। दोनों जाग रहे थे, हमें देख रहे थे। उनके हाथों में मोबाइल फोन था, जो वीडियो बना रहा था।


रहीम ने मुस्कुराकर कहा - "बड़ी रांड लगती हो तुम श्रद्धा। क्या नंगी होकर चुदना चाहती हो? हमारे साथ भी चुदोगी?" अकरम हँसा - "वीडियो बना ली है हमने। अब अगर शोर मचाया तो ये वीडियो इंटरनेट पर डाल देंगे। और तुम्हारी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी।


तो चुपचाप अपने पति को बोलो कि वह दूर हटे, और तुम अपनी गांड और चूत हमारे सामने फैलाओ। हम तुम्हें चोदेंगे, नहीं तो... समझ गई?" मैं डर गई। मैंने विनय की तरफ देखा। उसकी आँखें फटी हुई थीं, लेकिन वह कुछ नहीं बोला।


उसने अपना छोटा लंड पैंट में डाला और दूर हट गया। वह बस देखता रहा। अब मैं उन दो मुसलमानों के सामने नंगी थी, लाचार, उनकी रहम पर। अध्याय ५: दो लंडों के बीच में रहीम नीचे उतरा, उसके पीछे अकरम भी। दोनों ने अपने कुर्ते उतार दिए। उनके नीचे सिर्फ एक-एक कच्छा था। मैंने उनके लंड देखे।


रहीम का लंड बहुत बड़ा था - कम से कम ७ इंच, मोटा, काला सा, घुमावदार। अकरम का भी ६ इंच से अधिक, मोटा और लाल। मेरी चूत ने देखते ही पानी छोड़ा - भूख लगी थी इतने बड़े मांस के टुकड़े की। मैं कितनी लचर रांड थी कि डर के बावजूद मेरी चूत तरस गई। रहीम ने कहा - "पहले अपने पति को बता कि वह दरवाजे पर खड़ा रहे, किसी को अंदर न आने दे।"


विनय ने कहा - "जैसा वो चाहे।" वह दरवाजे पर चला गया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वह बेबस था। मैं उसे इतना बेबस देखकर कुछ कह नहीं पाई। अकरम ने मुझे आदेश दिया - "अपने पैर फैला, हमारे सामने अपनी चूत खोल।" मैंने पैर चौड़े कर दिए, दोनों घुटने मोड़े, अपनी चूत उनके सामने पेश कर दी - गीली, गुलाबी, खुली हुई। रहीम ने अपनी लंड निकाली।


वह मोटी और बड़ी मेरी चूत की तुलना में बहुत बड़ी लग रही थी। उसने हाथ से मेरी चूत को मसला, फिर बिना किसी तैयारी के अपनी मोटी लंड मेरी चूत में घुसाने लगा। "आह!...नहीं...रुको...बहुत बड़ी है..." मैं चीखी। लेकिन उसने मेरी चीख नहीं सुनी।


उसने एक झटके में अपनी पूरी ७ इंच लंड मेरी चूत के अंदर डाल दी। मेरी चूत फट गई जैसे अब तक कभी न फटी हो। विनय का ४ इंच का लंड तो बस खिलौना था, लेकिन रहीम की लंड असली हथियार थी। वह अंदर कड़ी थी, मोटी, मेरी हर दीवार को छीलती हुई निकल रही थी। मैं कराह रही थी, लेकिन साथ में दर्द और आनंद मिल रहा था।


रहीम ने जोर-जोर से झटके मारना शुरू किए। उसका लंड अंदर-बाहर हो रहा था, मेरी चूत का पानी बह रहा था, पूरा बिस्तर गीला हो गया। उसने एक हाथ से मेरे बूब्स को दबाया और दूसरे हाथ से मेरी गांड पर थप्पड़ मारा। "हाँ रांड...चिल्ला...चिल्ला अपने पति के सामने...देख वह देख रहा है अपनी बीवी को दूसरे मर्द के लंड पर...तेरी चूत कैसे रस छोड़ रही है मेरे लंड के लिए...तेरा पति तो बेकार है चार इंच का लंड...देख हमारा लंड कैसे तेरी चूत को फाड़ रहा है..." मैं रो रही थी और चिल्ला रही थी - "हाँ...हाँ...चोदो मुझे...मैं तुम्हारी रांड हूँ...तुम्हारी कुतिया..." मेरी जीभ लड़खड़ा रही थी, मेरा शरीर काँप रहा था।


अकरम पीछे से आया। उसने कहा - "अब मेरी बारी।" रहीम ने अपनी लंड बाहर निकाली। मेरी चूत से रस और लुंड का मैल टपक रहा था। अकरम ने मुझे चौपाया कर दिया - चारों पैरों पर खड़ा कर दिया। फिर उसने अपनी मोटी लंड मेरी चूत में डाली - इस बार पीछे से। वह भी जोर-जोर से झटके देने लगा। मेरे बूब्स नीचे झूल रहे थे, हर झटके से हिल रहे थे। लेकिन रहीम ने कहा - "अभी तो हो गई चूत, अब इसकी गांड चाहिए।" उसने मेरी गांड पर थप्पड़ मारा और कहा - "अपनी गांड खोल।


मैं तुम्हारी गुदा में लंड डालूँगा।" मैंने बिस्तर पर मुँह रखा और अपनी गांड फैलाई। उसने अपनी मोटी लंड पर थोड़ा थूका और मेरी गुदा पर रख दी। मैं दर्द से चीखी जब उसने अंदर घुसाना शुरू किया।


मेरी गुदा कभी इतनी बड़ी चीज के लिए नहीं खुली थी। वह धीरे-धीरे घुस रहा था, मैं दाँत पीस रही थी, आँखों से आँसू निकल रहे थे। लेकिन उसने पूरा अंदर डाल ही दिया। अब दो लंड मेरे अंदर थे - अकरम का मेरी चूत में और रहीम का मेरी गांड में। पहली बार डबल पेनिट्रेशन हो रहा था। मुझे लगा मैं फट जाऊँगी, लेकिन दोनों मिलकर मुझे चोद रहे थे, उनकी लंडों के झटके एक साथ पड़ रहे थे, अलग-अलग लय में।


मैं पागल हो गई थी। पूरी रात मैं उनके हाथों की कुतिया बनी रही। एक बार चूत में, एक बार गांड में, एक बार मुँह में लंड लेती। उन्होंने मेरा मुँह भरकर माल डाला, उस माल को मैंने निगल लिया, फिर से उनका लंड चूसा।


सुबह तक मेरी चूत लाल और सूजी हुई थी, मेरी गुदा से खून आने लगा था। लेकिन मैं भूखी थी - वह काली मोटी लंड देखते ही मेरी चूत फिर गीली हो जाती थी। सुबह के समय जब ट्रेन में टीटी (टिकट चेकर) आया, तब भी वे लोग मुझे नंगा रखे हुए थे।


मैं बिस्तर पर नंगी लेटी थी, मेरी चूत और गांड खुली पड़ी थी, टीटी ने देखा तो हैरान हो गया, लेकिन रहीम ने उसे ५०० रुपए देकर मुँह सिलवा दिया। टीटी ने कुछ नहीं कहा, बस चला गया। फिर जब स्टेशन पर वेंडर आया चाय-नाश्ता लेकर, तब भी मैं नंगी ही खड़ी थी, मेरे बूब्स और चूत सबके सामने खुले हुए।


रहीम ने वेंडर को भी डरा दिया था। मैं हार मान चुकी थी। विनय बस देखता रहता था, कभी-कभी रोता, लेकिन कुछ नहीं कर पाता था। मैंने उसे समझाया भी नहीं - मुझे अब इन मुसलमानों की लंडों की आदत पड़ गई थी।


उनके लंड मेरी चूत और गांड को इस कदर भरते थे कि मुझे लगता था मैं पूर्ण हूँ। विनय का ४ इंच का लंड अब मेरी चूत पर एक उंगली जैसा लगता था।


अगले ३६ घंटे मेरी जिंदगी के सबसे भड़कीले, सबसे दर्दनाक और सबसे सुहाने घंटे थे। मैं रहीम और अकरम की रांड बनकर रही। वे मुझे हर पोजिशन में चोदते रहे - कभी मैं उनकी गोद में बैठी, कभी उनके सामने घुटनों पे, कभी उनके पीछे सड़क पर जैसे जानवर।


मैंने उनके माल को चाटा, उनके लंड को चूसा, उनकी चूतड़ों पर हाथ फेरा। हर बार वे मुझे दोनों तरफ से भरते थे - एक चूत में, एक गांड में। रास्ते में कई स्टेशन आए, कई बार दरवाजा खुला, कई लोगों ने मुझे नंगा देखा - लेकिन मुझे शर्म नहीं आई।


मैंने महसूस किया मैं एक रांड हूँ, जन्म से लेकर मौत तक।

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