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मा और सुहानी आंटी ने चोदने की ट्रेनिंग दी : Antarvasana Sex Story

ये Antarvasana और Sex Story मेरी ज़िंदगी का वो राज़ है जिसे मैं कभी किसी को बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। हाँ, ये बिल्कुल सच है, एक ऐसा किस्सा जिसे सिर्फ़ मेरे ज़हन के कोने जानते हैं। मेरी उम्र उस वक़्त 19 साल थी और मैं अपनी माँ और उनकी सहेली सुहानी आंटी के साथ जयपुर के एक छोटे से फ्लैट में रहता था। पिताजी का देहांत मेरे बचपन में ही हो गया था, तो माँ ने ही मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया। सुहानी आंटी हमारी पड़ोसन थीं, करीब 36 साल की, गोरी-चिट्टी, भरी-पूरी औरत, जिनके पति आर्मी में थे और अक्सर बाहर ही रहते थे। माँ की उम्र 40 के आस-पास थी, साँवला रंग, लेकिन चेहरे पर एक अजीब सी रौनक और शरीर में वो कसावट जो सालों की ज़िम्मेदारी ने और निखार दी थी।


मैं उन दिनों बहुत शर्मीला और दुबला-पतला सा लड़का था। हॉस्टल से पढ़ाई पूरी करके जब वापस घर आया तो माँ को लगा मैंने अपनी सेहत का बहुत ख़्याल नहीं रखा। दिन भर किताबों में मुँह गड़ाए रहना, किसी लड़की से बात करना तो दूर, नज़रें मिलाने में भी शर्माता था। माँ और आंटी अक्सर आपस में मेरी इस हालत पर बातें करतीं, और उनकी नज़रों में एक अजीब सी चमक रहती जो मेरी समझ से परे थी। सुहानी आंटी जब भी हमारे घर आतीं, मेरे गाल खींचतीं, बालों में हाथ फेरतीं और माँ से कहतीं, |देख ना, तेरा बेटा कितना मासूम है, इसकी तो अभी तक कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं बनी| और फिर दोनों ठहाका लगाकर हँस पड़तीं। मुझे बेहद शर्मिंदगी होती, लेकिन अंदर ही अंदर उन दोनों की बेबाक हरकतें मेरे लिए एक अनकही खिंचाव का कारण बन रही थीं।


गर्मियों की एक दुपहरी थी जब लू अपने पूरे शबाब पर थी। बाहर सड़कें सुनसान थीं और हमारे फ्लैट का कूलर भी काम नहीं कर रहा था। माँ ने सुहानी आंटी को बुला लिया था ताकि दोनों साथ बैठकर आम का पना पिएँ और गप्पें मारें। मैं अपने कमरे में अंडरवियर पहने लेटा पंखे की हवा का मज़ा ले रहा था, बदन पर एक पतली सी चादर डाली हुई थी। माँ ने आवाज़ लगाई, |अर्जुन, ओ अर्जुन, ज़रा दो गिलास पानी ले आना बेटा| मैंने जल्दी से एक टी-शर्ट पहनी और पानी लेकर ड्राइंग रूम में गया। वहाँ का नज़ारा देखकर मेरे पैर ज़मीन पर ही गड़ गए। माँ सोफे पर पैर फैलाकर बैठी थीं, उनकी साड़ी का पल्लू पूरी तरह से कमर में खोंसा हुआ था और वो सिर्फ़ एक हल्के ब्लाउज़ में थीं जिसके नीचे से उनके भारी स्तनों का उभार साफ़ झलक रहा था। वहीं सुहानी आंटी ज़मीन पर दरी बिछाकर लेटी हुई थीं, उन्होंने पतला नाइटी पहना था जो पसीने से उनके बदन से ऐसे चिपक गया था जैसे दूसरी त्वचा हो। उनके कूल्हों का फैलाव और जाँघों का गोलाई सब कुछ बयाँ हो रही थी।


मैंने नज़रें झुकाकर गिलास टेबल पर रख दिए। तभी सुहानी आंटी ने अपने बदन को थोड़ा खिंचाव देते हुए कहा, |अरे अर्जू बेटा, इधर आ ना, तेरी माँ कह रही थी तू बहुत कमज़ोर हो गया है| मैंने हड़बड़ाते हुए माँ की तरफ देखा। माँ के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी। |हाँ अर्जुन, दिखा तो सही, हॉस्टल में तूने अपना कितना बुरा हाल कर लिया है,| कहते हुए माँ ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और मेरा हाथ पकड़कर अपने पास बिठा लिया। माँ की साँसों से शराब की हल्की सी गंध आ रही थी। शायद गर्मी से राहत पाने के लिए दोनों ने हल्की ठंडाई पी थी जिसमें कुछ मिला हुआ था।


|देख ना सुहानी, इसकी बाँहें तो बिल्कुल तीलियों जैसी हैं,| माँ ने मेरी टी-शर्ट की बाँह ऊपर कर दी। आंटी उठकर हमारे पास आ गईं। उन्होंने मेरी बाँह को दबाया और कहा, |हाँ यार, इसमें तो ताक़त ही नहीं है। एक काम करते हैं, आज से इसकी ट्रेनिंग शुरू करते हैं| मैं हैरत से उनका चेहरा देखने लगा। |कैसी ट्रेनिंग?| मेरे सवाल पर दोनों एक बार फिर ज़ोर से हँस दीं। माँ ने मेरी ठोड़ी पकड़कर कहा, |ज़िंदगी की ट्रेनिंग, बेटा। जवान हो गए हो, अब कब तक माँ के आँचल में छुपे रहोगे?|


उस शाम माहौल बहुत हल्का और अपनापे से भरा था। माँ और आंटी मुझसे मेरे हॉस्टल के किस्से पूछ रही थीं, ख़ासकर लड़कियों के बारे में। मैं शरमा-शरमाकर बता रहा था कि मेरा किसी से कोई ख़ास संपर्क नहीं है। ये सुनकर सुहानी आंटी ने माँ की तरफ देखते हुए एक आँख मारी, |तेरा बेटा तो अभी बिल्कुल कोरा है रीना। चल अच्छा है, हम इसे ख़ुद ही सब सिखाएँगी| मुझे उनकी बातें थोड़ी अटपटी लग रही थीं लेकिन माँ की सहमति देखकर मैंने चुप रहना ही मुनासिब समझा। थोड़ी देर में माँ उठीं और उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए कहा, |मैं तो अब ये साड़ी उतार कर कुछ आरामदेह पहनती हूँ, बहुत गर्मी है|


माँ अंदर चली गईं तो सुहानी आंटी ने मेरे और करीब सरकते हुए मेरे बालों में हाथ फेरा। उनके नाइटी के अंदर से उनके भारी स्तनों की दरार साफ दिख रही थी और मेरी नज़रें बार-बार वहीं अटक जातीं। |अच्छा अर्जुन, ये बता, तूने कभी किसी लड़की को अपने मन से छुआ है?| उनकी इस बेहद निजी सवाल पर मेरा चेहरा सुर्ख़ हो गया। मैंने अपना सिर हिलाकर ना में जवाब दिया। |अरे वाह, और तेरे यहाँ नीचे… कभी कोई हरकत हुई है?| कहते हुए उन्होंने अपनी नज़रें मेरी जाँघों पर जमा दीं। मैंने तुरंत अपनी टाँगें सिकोड़ लीं। उसी वक़्त माँ कमरे में आईं। लेकिन वो साड़ी नहीं, सिर्फ़ एक पारदर्शी सी लॉन्ग नाइटी पहनकर! उसमें से उनकी ब्रा और पेंटी का हल्का सा रंग छन रहा था। मैं सकते में आ गया।


माँ ने आते ही कहा, |सुहानी, कमबख़्त ये गर्मी तो जान ही ले लेगी। अर्जुन बेटा, ज़रा पंखा तेज़ कर दो और वो कूलर में पानी डाल दो, शायद कुछ हवा आ जाए| मैं जैसे-तैसे उठकर कूलर भर आया। जब वापस लौटा तो देखा माँ और सुहानी आंटी आपस में धीमी आवाज़ में कुछ बात कर रही थीं और बीच-बीच में मुझे देख रही थीं। मेरे आने पर वो चुप हो गईं। माँ ने मुझे अपने पास बुलाते हुए कहा, |आ बेटा, पास बैठ। तू बड़ा हो गया है, अब कुछ चीज़ें सीखनी ज़रूरी हैं वरना दुनिया में ज़िंदगी मुश्किल हो जाएगी| मैं चुपचाप उनके पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गया। मेरी नज़रें बार-बार माँ की जाँघों की तरफ उठ रही थीं जो उस नाइटी में और भी कसी हुई लग रही थीं।


|सुन बेटा,| माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए कहा, |मर्द का शरीर सिर्फ़ दिखने में मज़बूत होना काफी नहीं होता, उसे पता होना चाहिए कि एक औरत की ज़रूरतें क्या हैं| मैं चौंककर उन्हें देखने लगा। सुहानी आंटी ने माँ की बात पूरी करते हुए कहा, |देख अर्जुन बेटा, हम दोनों ने सोचा है कि आज से हम तुझे वो सब सिखाएँगी जो एक मर्द को औरत के साथ कैसे पेश आना चाहिए। ये हमारी तरफ से तेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक होगा। और तू घबरा मत, ये बिल्कुल नेचुरल है| मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। मैं क्या सुन रहा हूँ, ये यकीन करना मुश्किल था। ये वो पल था जिसे मैंने अपनी Antarvasana की सबसे गहरी तहों में भी कभी नहीं सोचा था।


माँ ने अपने हाथ से मेरा चेहरा ऊपर उठाते हुए कहा, |डरना नहीं अर्जुन, और ना ही शर्माना। हम तेरी अपनी हैं। सुहानी मेरी बहन जैसी है, और हम दोनों ने मिलकर ये तय किया है| मैं हिचकी के साथ बोला, |लेकिन माँ… ये…| सुहानी आंटी ने मेरी बात काटते हुए कहा, |कोई लेकिन-वेकिन नहीं। जब हम कह रहे हैं ना, तो सही ही कह रहे होंगे। अभी तू यहाँ लेट जा| उन्होंने अपनी जाँघों की तरफ इशारा किया। मैंने माँ की तरफ देखा, उन्होंने हामी में सिर हिलाया। मैं धीरे से ज़मीन पर लेट गया और माँ ने मेरा सिर अपनी मुलायम जाँघों पर रख लिया। उनकी त्वचा की गर्मी और नाइटी के कपड़े की महीन बनावट ने मेरे पूरे चेहरे पर एक सिहरन पैदा कर दी।


सुहानी आंटी मेरे ठीक सामने घुटनों के बल बैठ गईं और धीरे-धीरे मेरी टी-शर्ट ऊपर की तरफ सरकाने लगीं। उनकी उँगलियाँ मेरे पेट पर जब पड़ीं तो मेरी साँसें तेज़ हो गईं। |देख रीना, इसका सीना भी कितना सपाट है, इस पर तो थोड़ी मसाज करनी पड़ेगी| आंटी ने कहा और अपने हाथों से मेरी छाती को सहलाने लगीं। उनकी उँगलियाँ मेरे निप्पल्स के इर्द-गिर्द घूम रही थीं और मैं अपनी पूरी कोशिश के बावजूद अपनी प्रतिक्रिया रोक नहीं पा रहा था। मेरा लंड अब मेरे शॉर्ट्स के अंदर तनने लगा था और कपड़े में एक उभार बन गया था।


|हूँ… देख तो सही, ये तो थोड़ी सी छेड़-छाड़ में ही जाग गया,| माँ ने मेरी हालत देखकर मुस्कुराते हुए कहा। उनकी ऊँगली मेरे माथे पर फिर रही थी जबकि उनकी नज़रें सीधे मेरे लंड पर टिकी थीं। सुहानी आंटी ने धीरे से मेरे निप्पल को दबोचा और हल्का सा निचोड़ा। मेरे मुँह से एक हल्की सी आह निकल गई। |आह्ह्ह…| मेरी आवाज़ सुनकर दोनों मुस्कुरा दीं। |अभी तो बहुत कुछ बाकी है बेटा,| माँ ने कहा और झुककर मेरे माथे पर एक चुम्मा दिया। उनके होंठों का वो एहसास मानो बिजली का करंट बनकर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया।


सुहानी आंटी ने मेरी टी-शर्ट पूरी उतारकर एक तरफ फेंक दी। अब मेरे शरीर पर सिर्फ एक पतली सी शॉर्ट्स थी जिसके अंदर मेरा तना हुआ लण्ड बाहर निकलने के लिए बेचैन था। माँ ने मेरे बालों को सहलाते हुए अपनी जाँघें मेरे सिर के नीचे और जमा दीं। उनकी पिंडलियाँ मेरे कंधों से छू रही थीं। |अब तू बिल्कुल आराम से रह, जो हम कर रहे हैं उसे बस महसूस कर,| माँ की आवाज़ में एक अद्भुत मिठास और अधिकार था। सुहानी आंटी ने अपना चेहरा मेरी छाती के करीब लाकर अपनी गर्म साँसें मेरी त्वचा पर डालीं। उनकी साँसों की गर्मी मेरे अंदर एक अजीब सी हलचल मचा रही थी।


|आज पहला दिन है अर्जुन, तो हम जल्दबाज़ी नहीं करेंगी,| सुहानी आंटी ने कहा और अपनी जीभ बाहर निकालकर मेरी छाती के बीचों-बीच एक गीली लकीर खींच दी। उनकी जीभ के स्पर्श से मेरा पूरा बदन काँप उठा। |आआह्ह्ह्ह…| मैंने अपने दाँत भींच लिए ताकि और ज़ोर से आवाज़ ना निकले। माँ ने मेरी पेशानी पर अपनी उँगलियाँ फेरीं, |शाबाश बेटा, बिल्कुल रिलैक्स रह, इसे अपने ऊपर हावी मत होने दे। एक औरत को उस वक़्त सबसे ज़्यादा मज़ा आता है जब उसका मर्द ख़ुद पर कंट्रोल रखता है और फिर सही वक़्त पर अपना सब्र तोड़ता है| मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या सिखा रही हैं, मैं तो बस उस लम्हे को जी रहा था।


सुहानी आंटी की जीभ अब मेरे निप्पल के गिर्द चक्कर लगा रही थी। उन्होंने अपने होंठों से उसे हल्के से पकड़ा और चूसना शुरू कर दिया। उनका मुँह गर्म और गीला था, और मेरे निप्पल पर उनके दाँतों का हल्का दबाव मुझे बेहद उत्तेजित कर रहा था। इसी बीच माँ ने अपना हाथ नीचे खिसकाकर मेरे पेट पर रख दिया और धीरे-धीरे गोल-गोल घुमाने लगीं। उनकी उँगलियाँ मेरी शॉर्ट्स की इलास्टिक के पास आकर रुक गईं। |अब बोल, कैसा लग रहा है तुझे?| माँ ने प्यार से पूछा। |ब…बहुत अच्छा… माँ…| मेरी हकलाती आवाज़ सुनकर दोनों हँस दीं। |लगता है अभी बहुत कुछ सिखाना पड़ेगा रीना,| सुहानी आंटी ने माँ से कहा और अपनी गीली जीभ अब मेरी पसलियों पर फेरने लगीं।


माँ का हाथ धीरे-धीरे मेरी शॉर्ट्स के ऊपर से ही मेरे लंड को सहला रहा था। वो बाहर से कपड़े के ऊपर उसकी लंबाई और मोटाई को नाप रही थीं। |तूने तो कमाल का साइज़ पाया है अर्जुन, पर तुझे इसका इस्तेमाल करना नहीं आता,| माँ के मुँह से ये शब्द सुनकर मेरी आँखें फैल गईं। सुहानी आंटी ने अपनी चूसने की क्रिया रोकते हुए कहा, |हाँ, यही तो सिखाना है। चल अब इस शॉर्ट्स को भी उतारते हैं| मैंने शर्म से अपने हाथ अपनी शॉर्ट्स पर रख दिए लेकिन माँ ने मेरे हाथ हटा दिए। |कोई शर्म नहीं अपनी माँ और आंटी के सामने। हमने तुझे नंगा बचपन में देखा है, आज तो तू मर्द बना है, फिर शर्म कैसी?|


सुहानी आंटी ने मेरी शॉर्ट्स पकड़ी और धीरे से नीचे खींचने लगीं। जैसे ही शॉर्ट्स मेरी जाँघों से नीचे आई, मेरा लण्ड पूरे जोश के साथ बाहर कूद पड़ा। मेरी आँखें शर्म से बंद थीं। मैंने सुना दोनों ने एक साथ एक हल्की सी हँसी और आह भरी। |वाह रीना, तेरे बेटे का तो लौड़ा काफी मोटा और लंबा है। देख तो रंग भी कितना साफ़ है| सुहानी आंटी की टिप्पणी पर माँ ने गर्व से कहा, |हाँ, इसके पिता पर गया है। अब बस इसे चलाना सिखाना बाकी है| मैंने अपनी आँखें खोलीं तो देखा दोनों मेरे खड़े हुए लण्ड को एकटक देख रही थीं। माँ की उँगली धीरे से मेरे लंड की नोक पर आई और उन्होंने वहाँ से चिपचिपे पानी को छुआ।


|देख, ये है तेरे मर्दानगी का सबूत,| माँ ने अपनी ऊँगली मेरी आँखों के सामने लहराते हुए कहा। उनकी उँगली पर मेरे प्री-कम की चमक साफ दिख रही थी। |इसे अंग्रेज़ी में प्री-कम कहते हैं, जब तू किसी औरत के साथ होगा तो तेरे लण्ड से ये निकलेगा ताकि अंदर जाने में आसानी हो| माँ ने बेहद नैचुरल अंदाज़ में कहा जैसे मुझे गणित पढ़ा रही हों। सुहानी आंटी ने आगे बढ़कर मेरे लण्ड को अपनी मुट्ठी में भर लिया। उनका स्पर्श इतना कोमल और गर्म था कि मेरे मुँह से एक ज़ोरदार सिसकारी निकल गई। |उउउह्ह्ह्ह… आंटी…|


|चुप बेटा, अभी तो हमने छुआ ही है,| सुहानी आंटी ने कहा और मेरे लंड को जड़ से लेकर ऊपर तक धीरे-धीरे सहलाने लगीं। उनकी मुट्ठी ढीली थी, बस हल्की सी रगड़ दे रही थी। माँ ने मेरे सिर को सहलाते हुए कहा, |तू इसका अहसास ले, औरत का हाथ कितना नरम होता है। जब तू अपनी बीवी के साथ होगा, तो तुझे पता होना चाहिए कि उसे कैसे छूना है, कितना दबाव देना है| माँ का हाथ मेरे सिर पर था और आंटी का मेरे लण्ड पर, ये दोहरा अहसास मुझे पागल किए दे रहा था।


सुहानी आंटी ने अपने हाथों की गति तेज़ कर दी और अब मेरे लौड़े को ज़ोर से पकड़कर हिलाने लगीं। उनकी नज़रें मेरी आँखों पर टिकी थीं। |देख, जब मैं इस तरह पकड़कर हिलाती हूँ तो तुझे कैसा लगता है?| उनका सवाल था। |बहु… उह्ह्ह्ह… बहुत तेज़… लग रहा… है… आंटी…| मेरी टूटी-फूटी आवाज़ सुनकर माँ ने कहा, |अगर तेज़ लग रहा है तो बता दे, पर अपना कंट्रोल मत खोना। यही पहला सबक है। मर्द हमेशा कंट्रोल में रहता है| लेकिन मेरा 19 साल का शरीर तो अभी किसी और ही दुनिया में था। सुहानी आंटी के हाथों की मालिश से मेरा सारा ख़ून मानो मेरे लण्ड में ही इकट्ठा हो गया था। वो इसे कभी ऊपर से पकड़तीं तो कभी नीचे से, कभी पूरी मुट्ठी बंद करके ज़ोर से दबातीं तो कभी सिर्फ़ दो ऊँगलियों से बेहद हल्के से गुदगुदातीं।


|एक बात बता, तूने कभी अपने आप हिलाया है इसे?| माँ ने बड़े प्यार से पूछा। मैंने शर्म से आँखें बंद करके हाँ में सिर हिलाया। |देख मुँह खोलकर जवाब दे, इसमें शर्माने की कोई बात नहीं है| माँ ने मुझे डाँटते हुए कहा। |हाँ… हाँ माँ… मैंने… किया है| मेरा जवाब सुनकर सुहानी आंटी ने मेरे लंड को हल्के से निचोड़ा, |तो फिर आज हम तुझे असली मज़ा दिखाएँगी। हाथ से हिलाना और औरत के हाथ से हिलवाने में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है| ये कहते हुए उन्होंने अपनी हथेली पर अपनी ही लार गिराई और उसे मेरे लण्ड के ऊपरी सिरे पर मल दिया। अब उनका हाथ मेरे लण्ड पर बिना किसी रगड़ के बड़ी आसानी से फिसल रहा था।


|आआअह्ह्ह्हह… आंटी… ये… क्या… कर रही हैं…| मैं कराह उठा। |चुप, बस महसूस कर| माँ ने मेरा माथा चूमते हुए कहा। अब सुहानी आंटी ने अपने हाथ की गति बहुत तेज़ कर दी थी, और उनकी दूसरी हाथ मेरी जाँघों के अंदरूनी हिस्से को सहला रही थी। जहाँ-जहाँ वो छूतीं, मेरी त्वचा पर आग सी लग जाती। मेरी साँसें बुरी तरह फूल चुकी थीं और मैं अपने कूल्हों को हिलाने लगा था। |आराम से अर्जुन, अभी मत झड़ना| सुहानी आंटी ने तुरंत अपना हाथ हटा लिया।


मैं ज़ोर-ज़ोर से हाँफ रहा था। मेरा लण्ड बिना किसी सहारे के हवा में तना हुआ था और उसकी नोक से प्री-कम की बूँदें रिस रही थीं। माँ ने अपनी उँगली से वो तरल पदार्थ उठाया और मेरे होंठों पर लगा दिया। |चख, ये तेरे अपने जिस्म का रस है| मैंने बिना सोचे-समझे अपनी जीभ बाहर निकाली और चाट लिया। इस पूरी स्थिति ने मेरे होश उड़ा रखे थे। ये मेरी माँ थीं, जो मुझे ये सब सिखा रही थीं, और उनकी सहेली जो मेरा लंड पकड़कर ये हरकतें कर रही थीं।


|आज का पहला पाठ पूरा हुआ अर्जुन,| माँ ने एकाएक ऐलान कर दिया। |अब उठ, कपड़े पहन और जाकर एक गिलास ठंडा पानी पी| मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा। मेरा लण्ड अभी भी पूरी तरह से तना हुआ था। सुहानी आंटी ने मेरी शॉर्ट्स उठाकर मेरी तरफ फेंकते हुए कहा, |कल फिर से ट्रेनिंग होगी। तब तक इसके बारे में ज़्यादा सोचना मत, और हाँ, हिलाना भी मत| मैं शर्म से पानी-पानी हो रहा था। मैंने जल्दी से अपनी शॉर्ट्स पहनी और उठ खड़ा हुआ। माँ और सुहानी आंटी सोफे पर एक दूसरे से सटकर बैठी हुई थीं और मुझे घूर रही थीं। |जाओ, पानी पियो और आराम करो| माँ ने आदेश दिया।


मैं अपने कमरे में आ गया। मेरा दिमाग सुन्न था और शरीर बेतहाशा उत्तेजना से भरा हुआ। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा कुछ हो सकता है। लेकिन मेरा अनुभव ये कह रहा था कि यह सब हकीकत था, मेरी अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी Antarvasana। मैं बिस्तर पर लेटकर छत को देखने लगा। अगले दिन की ट्रेनिंग के बारे में सोचकर मेरे शरीर में फिर से बिजली दौड़ गई। माँ और सुहानी आंटी ने मिलकर मुझे चोदने की ट्रेनिंग देने का जो बीड़ा उठाया था, उसने मेरी पूरी सोच को बदलकर रख दिया था। और ये तो बस शुरुआत थी, अगले दिन जो हुआ वो मेरी कल्पना से भी परे था।


अगली सुबह मेरी आँखें खुलीं तो एक अलग ही तरह की बेचैनी थी। नहा-धोकर जब मैं किचन में पानी पीने गया तो देखा सुहानी आंटी पहले से ही आई हुई थीं। वो माँ के साथ बैठकर चाय पी रही थीं। मुझे देखते ही वो मुस्कुरा दीं। |गुड मॉर्निंग स्टूडेंट| सुहानी आंटी ने अपनी चाय की चुस्की लेते हुए कहा। |गुड… गुड मॉर्निंग| मैंने हकलाते हुए जवाब दिया। माँ ने अपने हाथ से मेरे लिए भी चाय का प्याला भरा और कहा, |पी ले, आज दिन भर की ट्रेनिंग है, एनर्जी चाहिए होगी|


थोड़ी देर बाद जब मैंने जाने का बहाना किया तो माँ ने कहा, |कहाँ जा रहा है? सुहानी के घर चलना है, यहाँ से ज़्यादा प्राइवेसी रहेगी| हम तीनों सुहानी आंटी के फ्लैट में चले गए जो हमारी बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर था। वहाँ पहुँचते ही सुहानी आंटी ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। उनका फ्लैट बहुत सुंदर ढंग से सजा हुआ था। माँ ने आते ही अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और पंखे के नीचे बैठ गईं। |आज हम लोग थोड़ा आगे बढ़ेंगे| सुहानी आंटी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।


|कल हमने तुझे बताया कि तेरे शरीर को कंट्रोल में कैसे रखना है, आज हम तुझे सिखाएँगी कि औरत के शरीर के साथ कैसे पेश आना है| माँ ने अपने पैर सामने फैलाते हुए कहा। उनकी पिंडलियाँ चिकनी और सुडौल थीं। |सुहानी, तू लेट जा, मैं इसको एक बार शुरुआत करवा दूँ| मेरी माँ के ये शब्द सुनकर मैं सन्न रह गया। सुहानी आंटी बिना किसी हिचक के ज़मीन पर बिछी चादर पर लेट गईं। उन्होंने आज हल्के नीले रंग का सूट पहना था, जिसमें से उनके भारी स्तन और चौड़े कूल्हे बाहर झाँक रहे थे।


|आ अर्जुन, पास बैठ| माँ ने कहा और मुझे सुहानी आंटी के पास ले गईं। |जब भी किसी औरत के साथ हो, तो सबसे पहले तारीफ कर। औरत को ये अहसास कराना बहुत ज़रूरी है कि तू उसे चाहता है| माँ मेरे पीछे खड़ी होकर मुझे निर्देश दे रही थीं। |बोल, सुहानी आंटी से कहो कि वो आज बहुत ख़ूबसूरत लग रही हैं| मैंने हड़बड़ाकर कहा, |आप… आप बहुत ख़ूबसूरत लग रही हैं आंटी| सुहानी आंटी ने मुस्कुराकर अपना हाथ मेरे चेहरे पर फेरा, |गुड बॉय|


|अब इनके पैरों को छू,| माँ की आवाज़ आई। मैंने अपना हाथ बढ़ाकर सुहानी आंटी के पैर पर रख दिया। उनके पैर छोटे और मोटे थे, बेहद मुलायम। |यूँ ही मत रख, उँगलियों से सहला, तलवे को दबा, देख औरत के पैर कितने नाज़ुक होते हैं| माँ मेरे कान के पास आकर फुसफुसाईं। मैंने धीरे-धीरे अपनी उँगलियाँ आंटी के तलवे पर फेरीं। वो गुदगुदाकर हल्की सी सिसकीं। |बहुत अच्छा…| उन्होंने कहा। मेरा आत्मविश्वास थोड़ा बढ़ा।


माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और अब आंटी की पिंडली पर रख दिया। |अब धीरे-धीरे ऊपर बढ़, रगड़ मत, बस सहला, जैसे किसी कीमती चीज़ को छू रहा हो| मैं माँ के निर्देशों का पालन करता रहा। मेरा हाथ अब आंटी के घुटने के ऊपर पहुँच गया था। उनकी त्वचा बर्फ़ की तरह चिकनी और गर्म थी। मेरी नज़रें आंटी के चेहरे पर थीं, जो अपने होंठ दबाए हुए थीं और उनकी साँसें थोड़ी तेज़ हो चली थीं।


|अब रुक,| माँ ने कहा। |सुहानी, अब तू अपना सूट उतार, ताकि ये सीधे त्वचा को छू सके| सुहानी आंटी ने धीरे से अपना कुर्ता उतार दिया। अब वो सिर्फ अपनी ब्रा और सलवार में थीं। उनका पेट हल्का सा निकला हुआ था, जो और भी कामुक लग रहा था। माँ ने मेरा हाथ आंटी के पेट पर रख दिया। |अब इस तरफ ध्यान दे, बहुत सारे मर्द यहीं गलती करते हैं, सीधे चूचियों पर झपटते हैं। औरत के लिए प्यार की शुरुआत पेट से होती है| मेरा हाथ आंटी के पेट पर गोल-गोल घूम रहा था।


|अर्जुन, अपना चेहरा नीचे ला और इनके पेट पर होठ रख| माँ की आज्ञा का पालन करते हुए मैंने आंटी की नाभि के पास अपने होंठ टिका दिए। आंटी ने एक गहरी साँस ली और अपना पेट हल्के से अंदर की तरफ खींच लिया। मैंने अपने होंठों से उनकी त्वचा को चूसना शुरू कर दिया। |आआह्ह्ह… हाँ अर्जुन… बिल्कुल ऐसे ही…| सुहानी आंटी के मुँह से हल्की सी कराह निकली। माँ ने मेरे बालों में हाथ फेरते हुए कहा, |शाबाश बेटा, अब ज़रा अपनी जीभ बाहर निकाल और नाभि के अंदर डाल|


मैंने अपनी जीभ निकालकर सुहानी आंटी की नाभि में डाल दी। वो एकदम तन गईं और उनके हाथों ने मेरी गर्दन पकड़ ली। |यस्स्स…| उनकी गर्म साँसें मेरे सिर पर पड़ रही थीं। माँ मेरे पीछे खड़ी-खड़ी ये सब देख रही थीं। उन्होंने झुककर मेरी शर्ट उतार दी और मेरी पीठ पर अपनी उँगलियों के नाखून गड़ाने लगीं। पीछे से माँ का वो स्पर्श और सामने आंटी की गर्म त्वचा, मैं दोनों के बीच में पिस रहा था।


|अब ब्रा उतारो इनकी| माँ ने मेरे कान में कहा। मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने सुहानी आंटी के पीछे हाथ ले जाकर उनकी ब्रा के हुक खोलने की कोशिश की। मेरी घबराहट देखकर आंटी ने ख़ुद ही अपनी पीठ उठाकर हुक खोल दिए और ब्रा ढीली कर दी। माँ ने मेरा हाथ पकड़कर ब्रा की डोरी पर रखा और खींचने को कहा। मैंने धीरे से ब्रा हटाई तो सुहानी आंटी के दो बड़े-बड़े स्तन बाहर आ गए। उनके स्तन सफ़ेद और मुलायम थे, और निप्पल बड़े और गहरे भूरे रंग के। मेरा मुँह सूख गया।


|अब इन्हें हाथ लगा| माँ ने कहा। मैंने डरते-डरते अपने दोनों हाथ आंटी के स्तनों पर रख दिए। वो इतने मुलायम थे कि मेरे हाथ उनमें धँस से गए। |उह्ह्ह्ह… अर्जुन… हल्के से सहला…| आंटी ने अपनी आँखें बंद करके कहा। मैंने अपनी हथेलियों को गोल-गोल घुमाना शुरू किया। मेरी उँगलियाँ उनके निप्पल को बार-बार छू रही थीं और हर छुअन पर आंटी का बदन तड़प उठता था।


|निप्पल को दबा, हल्के से| माँ ने हिदायत दी। मैंने अपनी उँगली और अँगूठे के बीच आंटी का एक निप्पल पकड़ा और हल्के से निचोड़ा। |आआअह्ह्ह्हह… हाँ…| आंटी ज़ोर से कराह उठीं। माँ ने मेरा सिर आगे की तरफ धकेलते हुए कहा, |अब इसे मुँह में ले और चूस| मैंने झुककर सुहानी आंटी के स्तन को अपने मुँह में ले लिया। मेरे मुँह में उनके निप्पल का खारापन और त्वचा का नमकीन स्वाद भर गया। मैं ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगा, जैसे भूखा बच्चा दूध पी रहा हो।


|आह्ह्ह… हाँ बेटा… ऐसे ही… चूस…| सुहानी आंटी ने मेरा सिर पकड़कर अपने स्तनों से भींच लिया। माँ ने पीछे से मेरी पैंट खोल दी और मेरे लंड को बाहर निकाल लिया। हवा का हल्का झोंका लगते ही मैं चौंका। माँ मेरे तने हुए लण्ड को अपने हाथ में लेकर बेहद हल्के-हल्के सहला रही थीं। सामने आंटी की चूचियाँ और पीछे माँ की उँगलियाँ, मेरी हालत ख़राब थी।


|अब थोड़ा नीचे जा, सलवार उतार इनकी| माँ ने फिर से निर्देश दिया। मैंने सुहानी आंटी के स्तनों को चूसना बंद किया और उनकी सलवार की डोरी खोली। आंटी ने अपने कूल्हे उठाए और मैंने उनकी सलवार नीचे खींच ली। वो सलवार के नीचे सिर्फ एक छोटी सी काली पेंटी पहने थीं जिसमें से उनकी चूत की दरार साफ़ झलक रही थी। मेरी नज़रें वहीं गड़ गईं।


|पेंटी उतारो| माँ ने कहा। मैंने काँपते हाथों से उनकी पेंटी पकड़ी और नीचे सरका दी। जैसे ही पेंटी हटी, सुहानी आंटी की जंगली और घनी चूत सामने आ गई। उनकी चूत के बाल घने, काले और चमकदार थे, और उनके बीच से उनकी गुलाबी चूत की झलक दिख रही थी जो गीली हो चुकी थी। सुहानी आंटी ने अपनी जाँघें थोड़ी और खोल दीं ताकि मैं बेहतर देख सकूँ।


|ये है औरत की चुत,| माँ ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। |यही वो जगह है जहाँ तुम्हें जाना है, जहाँ तुम्हें अपनी मर्दानगी साबित करनी है| माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और सीधे सुहानी आंटी की चूत पर रख दिया। मेरी उँगलियाँ उनकी नमी से भीग गईं। आंटी ने एक तेज़ सिसकारी भरी और अपने कूल्हे ऊपर की तरफ उचका दिए। |हाँ अर्जुन… छू मुझे…|


|अब अपनी ऊँगली अंदर डाल| माँ ने कहा। मैंने अपनी एक उँगली आंटी की चूत के छेद पर लगाई और धीरे से अंदर धकेल दी। चूत का अंदरूनी हिस्सा गर्म, गीला और बेहद तंग था। मेरी ऊँगली के चारों तरफ उनकी माँसपेशियों ने जकड़ लिया। |उह्ह्ह्ह… यसsss…| सुहानी आंटी चीख़ पड़ीं।


|हिला अपनी उँगली को, अंदर-बाहर कर| माँ मुझे गाइड कर रही थीं। मैंने अपनी ऊँगली को सुहानी आंटी की चुत में आगे-पीछे करना शुरू कर दिया। हर बार जब मेरी ऊँगली अंदर जाती तो एक गीली आवाज़ निकलती और आंटी की कराह तेज़ हो जाती। |आआआह्ह्ह… और तेज़…| उनकी गुहार पर मैंने अपनी ऊँगली की गति तेज़ कर दी। इसी बीच माँ ने मेरे लंड को ज़ोर से पकड़कर हिलाना शुरू कर दिया।


|देख अर्जुन, अब तेरी ऊँगली इनकी चुत में है, और तेरा लंड मेरे हाथ में है। जब तू किसी लड़की के साथ हो तो अपना पूरा फोकस उसी पर रख, लेकिन अपने शरीर को भी मत भूल| माँ मानो एक उस्ताद की तरह मुझे समझा रही थीं। मेरी साँसें तेज़ हो चली थीं और मुझे लगा कि मैं अब झड़ जाऊँगा। लेकिन तभी माँ ने मेरे लण्ड को जड़ से पकड़कर बुरी तरह दबोच लिया। |अभी नहीं, अभी नहीं झड़ना| उन्होंने सख़्ती से कहा। दर्द से मेरी उत्तेजना कम हो गई।


|अब अपनी ऊँगली बाहर निकाल| माँ ने कहा। मैंने अपनी ऊँगली बाहर खींची तो वो पूरी तरह से आंटी के रस से भीगी हुई थी। |चाट अपनी ऊँगली| माँ के इस आदेश पर मैंने अपनी ऊँगली मुँह में डाल ली। आंटी का रस हल्का नमकीन और अजीब सी खुशबू वाला था, लेकिन उसका स्वाद नशीला था। |अब तू लेट जा अर्जुन, अब सुहानी तुझे सिखाएगी| माँ ने मुझे पीछे खींचा और मैं चादर पर लेट गया।


सुहानी आंटी अपनी जगह से उठीं। उनका पूरा शरीर नंगा था, सिर्फ उनके बालों की लटें उनके चेहरे पर आ रही थीं। उनका भरा-पूरा बदन पसीने से चमक रहा था। उन्होंने अपनी लटों को पीछे किया और मेरी तरफ मुस्कुराकर देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी भूख थी। वो मेरे पास आईं और मेरे पेट पर बैठ गईं। उनकी गीली चूत सीधे मेरी त्वचा को छू रही थी और मेरा लंड उनके कूल्हों के पीछे फँसा हुआ था।


|अब देख, अर्जुन, तूने ऊपर वाले हिस्से को तो संभाल लिया, अब ज़रा नीचे वाले हिस्से का सबक भी सीख ले| सुहानी आंटी ने कहा और अपने कूल्हों को मेरे पेट पर घिसना शुरू कर दिया। उनकी चुत का रस मेरे पेट पर लग रहा था। फिर वो थोड़ा पीछे सरकीं और उन्होंने मेरे लण्ड को अपनी चूत की दरार में रख लिया। मेरे लौड़े का ऊपरी हिस्सा उनकी चूत के बालों से रगड़ खा रहा था और मुझे बेहद ज़ोरदार उत्तेजना हो रही थी।


माँ हमारे पास ही बैठी थीं। वो अपनी नाइटी के अंदर अपने ही स्तनों को दबा रही थीं। |अब सुहानी, इसे चोदने का असली मतलब समझा| माँ ने कहा। ये वो पल था जिसका मुझे इंतज़ार था। सुहानी आंटी ने अपने हाथों से मेरे लण्ड को पकड़ा और अपनी चूत के मुँहाने पर लगाया। उनके चेहरे पर गंभीरता थी। |तैयार है मेरे बच्चे?| उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने डर और उत्तेजना से भरे स्वर में हाँ कहा।


सुहानी आंटी ने धीरे-धीरे अपना वज़न नीचे डालना शुरू किया। मेरे लंड का सुपारा जैसे ही उनकी चूत के छेद को छूकर अंदर घुसा, दोनों की साँसें थम गईं। |उह्ह्ह्ह… माँ… ये… कितना…| मैंने कराहते हुए कहा। आंटी की चुत इतनी गर्म और गीली थी कि मेरा लंड धीरे-धीरे उनके अंदर खिसकता जा रहा था। |श्श्श… आराम से…| सुहानी आंटी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने कूल्हों को नीचे की ओर धकेलती रहीं। जब मेरा पूरा लंड उनकी चुत के अंदर समा गया तो दोनों ने राहत की एक गहरी साँस छोड़ी।


|अब हिलना शुरू कर, पहले तू| आंटी ने कहा और मेरे सीने पर हाथ रखकर ख़ुद स्थिर हो गईं। मैंने अपने कूल्हों को ऊपर की तरफ उठाना शुरू किया। मेरी ये पहली चुदाई थी और मेरे अंदर की हर कोशिका जैसे जाग उठी थी। मैं ज़ोर-ज़ोर से अपना लौड़ा आंटी की चुत में ऊपर-नीचे करने लगा। |आह्ह्ह… आआअह्ह्ह्हह… अर्जुन… येस्स… तू तो… कुदरती… चुदक्कड़ निकला…| आंटी ज़ोर से चिल्लाने लगीं।


माँ ने मेरी पीठ के नीचे तकिया रख दिया ताकि मैं और ज़ोर से चोद सकूँ। |शाबाश अर्जुन, उसे चोद, ज़ोर से चोद| माँ के चेहरे पर अपने बेटे की सफलता पर गर्व और एक गहरी हवस का मिश्रण था। उन्होंने अपनी नाइटी उतार दी और अपनी चूत को अपनी ऊँगलियों से सहलाने लगीं। अब वो मेरे ठीक सरहाने खड़ी थीं, उनकी चूत से रस टपक रहा था।


|अब सुहानी, तू लय पकड़| माँ ने कहा। सुहानी आंटी ने मेरी गति पकड़ ली और अब वो मेरे साथ ताल मिलाकर उछल-उछलकर मेरा लंड अपनी चूत में ले रही थीं। हर बार जब वो नीचे आतीं तो मेरा लंड उनके गर्भाशय के मुँहाने तक जा पहुँचता। कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़, चुदाई की गीली चप-चप की आवाज़, और हमारी कराहें गूँज रही थीं।


|बहुत हुआ, अब पोज़ बदलो| माँ ने एकाएक हमें अलग किया। सुहानी आंटी ने मुझसे कहा, |अब तू ऊपर आ, मुझे कुत्ते की तरह चोद| ये वो पोज़ीशन थी जिसे मैंने फिल्मों में देखा था लेकिन कभी सोचा नहीं था कर पाऊँगा। आंटी अपने हाथों और घुटनों के बल आ गईं। उनकी पीठ धनुष की तरह मुड़ी हुई थी और उनकी चूत पीछे से पूरी तरह खुली और गीली दिख रही थी। मैं उनके पीछे घुटनों के बल बैठ गया। माँ ने मेरा लंड पकड़ा और सही दिशा में लगाया। |अब अपनी पूरी ताक़त से चोद|


मैंने एक झटके में अपना पूरा लण्ड आंटी की चूत में घुसा दिया। |आआआअह्ह्ह्हहह… हाँ… यही तो चाहिए था… मुझे चोद… चोदते रह…| आंटी बदहवास होकर चिल्ला रही थीं। मैंने उनके कूल्हों को पकड़ लिया और मशीन की तरह अपना लण्ड अंदर-बाहर करने लगा। मेरी जाँघें उनके कूल्हों से टकरा रही थीं और उनके स्तन ज़ोर-ज़ोर से हिल रहे थे। माँ मेरे बगल में आकर बैठ गईं और अपनी उँगलियाँ अपनी चुत में डालकर मेरी गति के साथ ताल मिलाने लगीं।


|आह्ह्ह… माँ… अब मैं… रोक नहीं पाऊँगा…| मैंने चेतावनी दी। मेरे अंदर एक तूफ़ान उठ रहा था। माँ ने तुरंत मेरे लण्ड को बाहर खींचा और अपने मुँह में ले लिया। उनकी ये प्रतिक्रिया इतनी तेज़ थी कि मुझे संभलने का मौका ही नहीं मिला। माँ मेरे लौड़े को चूसने लगीं, जोर से चूसने लगीं। उनकी जीभ मेरे लण्ड के निचले हिस्से पर फिर रही थी और उनके होंठ तने हुए थे।


सुहानी आंटी भी मुड़कर हमारे पास आ गईं और माँ के साथ मिलकर मेरे लण्ड को चाटने लगीं। दो ज़बानें मेरे लण्ड पर साँप की तरह लिपट रही थीं। माँ सुपारे को चूस रही थीं और सुहानी आंटी मेरे गोटों को। ये अहसास इतना तीव्र था कि मेरी चीख निकल गई। |आआआ… उह्ह्ह्ह्ह… अब… गिर रहा… हूँ…| और उसी पल मेरे लंड ने माँ के मुँह में मलाई की तरह गाढ़ा और ढेर सारा वीर्य उगल दिया। माँ ने मेरी एक-एक बूँद पी ली, बिना किसी हिचकिचाहट के।


मैं ज़मीन पर गिर पड़ा। मेरी साँसें थम नहीं रही थीं। सुहानी आंटी ने मेरे माथे को चूमा और कहा, |तूने आज ग्रेजुएशन की पहली क्लास पास कर ली अर्जुन। पर तेरी ट्रेनिंग अभी बाकी है| माँ ने अपने मुँह को पोंछते हुए कहा, |हाँ, अभी तो हमने तुझे सिर्फ एक पोज़ सिखाया है। आने वाले दिनों में तुझे चुदाई की हर कला में माहिर बनाना है|


मैं लेटा-लेटा उन दोनों को देख रहा था। उनकी नंगी देहें मेरे सामने थीं, और उनकी चूतें अभी भी गीली थीं। उन्हें संतुष्ट करना अभी बाकी था, लेकिन आज का पाठ पूरा हो चुका था। माँ और सुहानी आंटी ने मिलकर मुझे चोदने की जो ट्रेनिंग देनी शुरू की थी, उसका ये पहला अध्याय था। मेरी ये असल ज़िंदगी की कहानी सिर्फ मेरे दिल के किसी कोने में दबी थी। आने वाले दिनों में मैंने उन दोनों को बारी-बारी से और एक साथ चोदना सीखा। उन्होंने मुझे हर वो पोज़ सिखाया जिसमें एक औरत को असली मज़ा आता है। माँ ने मुझे बताया कि औरत के शरीर का हर हिस्सा कितना संवेदनशील है और सुहानी आंटी ने मुझे ये एहसास कराया कि एक मर्द का असली हथियार सिर्फ उसका लंड नहीं, बल्कि उसकी ज़बान और उसका सब्र भी है। उस गर्मी की दुपहरी से शुरू हुई ये ट्रेनिंग कई हफ़्तों तक चली, और हर दिन एक नया पाठ लेकर आता था।


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