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तीन भाभियों को प्रेग्नेंट किया : मजेदार फ़ैमिली चुदाई कहानी : Hindi Sex Stories

मेरा नाम मंगल है। मैं आज आपको अपने खानदान की एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जो बेहद निजी और गुप्त है। मेरे हिसाब से मैंने कुछ गलत नहीं किया, लेकिन कुछ लोग इसे पाप समझ सकते हैं। ये कहानी पढ़कर आप ही तय कीजिएगा कि जो हुआ, वो सही था या गलत।


ये बात कई साल पहले की है, जब मैं अठारह साल का था। हमारा परिवार राजकोट से पचास किलोमीटर दूर एक छोटे से गाँव में जमींदार है। हमारे पास सौ बीघा खेती है, चार घर, कई दुकानें और लंबा-चौड़ा कारोबार। मेरे माता-पिता का देहांत तब हो गया था, जब मैं दस साल का था। मेरे बड़े भैया काशी राम और उनकी पहली पत्नी सविता भाभी ने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया। भैया मुझसे तेरह साल बड़े हैं। उनकी पहली शादी तब हुई थी, जब मैं आठ साल का था। सविता भाभी को पाँच साल तक कोई संतान नहीं हुई। कई डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन सब बेकार। फिर भैया ने दूसरी शादी की—चंपा भाभी से, तब मैं तेरह साल का था।


चंपा भाभी को भी बच्चा नहीं हुआ। सविता और चंपा भाभी की हालत खराब हो गई। भैया उनका व्यवहार नौकरानियों जैसा करने लगे। मुझे लगता है कि भैया ने दोनों भाभियों को संतान की आस में छोड़ना बंद कर दिया था। फिर, तीन साल बाद भैया ने तीसरी शादी की—सुमन भाभी से। तब मैं सोलह साल का हो चुका था। मेरे शरीर में बदलाव शुरू हो गए थे—वृषण बड़े हुए, कांख और लंड पर बाल उग आए, आवाज भारी हो गई, मूँछें निकल आईं। मेरा लंड लंबा और मोटा हो गया था—लगभग आठ इंच लंबा और ढाई इंच मोटा। रात को स्वप्नदोष होने लगा। मैं मुठ मारना सीख गया था।


सविता और चंपा भाभी को पहले देखकर मेरे मन में कोई गलत ख्याल नहीं आया, क्योंकि मैं बच्चा था। लेकिन सुमन भाभी की बात अलग थी। वो मुझसे सिर्फ चार साल बड़ी थीं—यानी बीस साल की। उनकी खूबसूरती मुझे भा गई थी। गोरा रंग, पाँच फीट पाँच इंच की लंबाई, साठ किलो वजन, पतला बदन, लंबे रेशमी बाल, बड़ी-बड़ी काली आँखें, नर्गिस जैसा चेहरा, सपाट पेट, गोल और भारी नितंब, पतली कमर। हँसते वक्त उनके गालों में डिंपल पड़ते थे। उनके छोटे-छोटे स्तन हमेशा ब्रा में ढके रहते थे, लेकिन उनकी शंकु आकृति साफ दिखती थी। उनके आने के बाद मैं हर रात सोचता कि भैया उन्हें कैसे चोदते होंगे। उनके नाम की मुठ मारने लगा। भैया भी दिन-रात उनके पीछे पड़े रहते थे। सविता और चंपा भाभी की कोई कीमत नहीं थी। हालाँकि, मुझे लगता था कि भैया कभी-कभी उन्हें भी चोदते होंगे, लेकिन उनका पूरा ध्यान सुमन भाभी पर था। भैया को लगता था कि उनका लंबा लंड और ढेर सारा वीर्य बच्चा पैदा करने के लिए काफी है। उन्होंने कभी अपने वीर्य की जाँच नहीं करवाई।


सुमन भाभी से मेरी अच्छी बनती थी, क्योंकि उम्र का फासला कम था। वो मुझे बच्चा ही समझती थीं। उनकी मौजूदगी में कभी उनका पल्लू खिसक जाता, तो वो शर्माती नहीं थीं। कई बार मुझे उनके गोरे-गोरे स्तन दिखे। एक बार वो स्नान के बाद कपड़े बदल रही थीं, और मैं अचानक कमरे में घुस गया। उनका आधा नंगा बदन देखकर मैं शरमा गया, लेकिन वो बिना हिचक बोलीं, “दरवाजा खटखटाकर आया करो, मंगल।”


दो साल ऐसे गुजर गए। मैं अठारह का हो गया और गाँव की स्कूल में बारहवीं में पढ़ने लगा। भैया चौथी शादी की सोच रहे थे। तभी कुछ ऐसी घटनाएँ हुईं, जिन्होंने मेरी जिंदगी बदल दी।


हमारे घर एक नौकरानी थी—बसंती। वो मेरी उम्र की थी, अठारह साल की। मैंने उसे बचपन से बड़ा होते देखा था। बसंती खूबसूरत नहीं थी—पाँच फीट दो इंच की ऊँचाई, पचास किलो वजन, साँवला रंग, गोल चेहरा, काली आँखें और बाल। लेकिन उसके स्तन उम्र से ज्यादा बड़े और लुभावने थे। पतली चोली में उसकी छोटी-छोटी निपल्स साफ दिखती थीं। मैं खुद को रोक नहीं पाया। एक दिन मौका देखकर मैंने उसके स्तन पकड़ लिए। उसने गुस्से में मेरा हाथ झटक दिया और बोली, “आइंदा ऐसी हरकत की, तो बड़े सेठ को बता दूँगी।” भैया के डर से मैंने फिर बसंती को नहीं छुआ।


पिछले साल सत्रह की उम्र में बसंती की शादी हो गई थी। ससुराल में एक साल रहकर वो दो महीने के लिए मायके आई थी। शादी के बाद उसका बदन और भरा हुआ था। उसके भारी नितंब और बड़े स्तन देखकर मेरा मन उसे चोदने को मचल उठता था, लेकिन वो मुझसे कतराती थी। मैं डर के मारे दूर से ही उसे देखता और लार टपकाता।


अचानक एक दिन माहौल बदल गया। बसंती मेरे सामने मुस्कराने लगी। काम करते वक्त मुझे गौर से देखती। मुझे अच्छा लगता, लेकिन डर भी लगता था। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। एक दोपहर मैं अपने स्टडी रूम में पढ़ रहा था। मेरा स्टडी रूम अलग मकान में था, जहाँ मैं सोता भी था। बसंती वहाँ आई और रुआँसी सूरत बनाकर बोली, “इतने नाराज़ क्यूँ हो मुझसे, मंगल?”


मैंने कहा, “नाराज़? मैं कहाँ नाराज़ हूँ?”


उसकी आँखों में आँसू आ गए। वो बोली, “मुझे मालूम है, उस दिन मैंने तुम्हारा हाथ झटक दिया था ना? लेकिन मैं क्या करती? डर लगता था, और दबाने से दर्द भी हुआ था। माफ कर दो, मंगल।”


इतने में उसका पल्लू खिसक गया—पता नहीं अपने आप या जानबूझकर। उसकी लो-कट चोली में से उसके गोरे स्तनों का ऊपरी हिस्सा दिखने लगा। मेरा लंड तन गया। मैंने कहा, “माफ करने जैसी कोई बात नहीं। मैं नाराज़ नहीं हूँ।”


वो मुस्कराई और मुझसे लिपट गई। बोली, “सच्ची? ओह, मंगल, मैं इतनी खुश हूँ। मुझे डर था कि तुम मुझसे रूठ गए हो। लेकिन मैं तुम्हें माफ नहीं करूँगी, जब तक तुम मेरी चूचियाँ फिर से नहीं छूओगे।” शर्म से उसने नजरें झुका लीं। मैंने उसे अलग किया, तो उसने मेरी कलाई पकड़कर मेरा हाथ अपने स्तन पर रख दिया और दबाए रखा।


मैंने कहा, “छोड़, पगली, कोई देख लेगा तो मुसीबत हो जाएगी।”


वो बोली, “तो होने दो। पसंद आई मेरी चूची? उस दिन तो कच्ची थी, छूने में दर्द होता था। आज मसल भी डालो, मज़ा आएगा।”


मैंने हाथ छुड़ाया और कहा, “चली जा, कोई आ जाएगा।”


वो बोली, “जाती हूँ, लेकिन रात को आऊँगी। आऊँ ना?”


रात को आने का ख्याल सुनते ही मेरा लंड और तन गया। मैंने पूछा, “जरूर आएगी?” और हिम्मत जुटाकर उसके स्तन को छुआ। उसने बिना विरोध बोली, “जरूर आऊँगी। तुम ऊपर वाले कमरे में सोना। और ये बता, तुमने किसी लड़की को छोदा है?”


मैंने कहा, “नहीं तो।” और उसके स्तन को दबाया। ओह, क्या नरम और भारी स्तन थे। उसने पूछा, “मुझे चोदना है?” मैं चौंक पड़ा।


“हाँ… हाँ।”


“लेकिन बेकार कुछ नहीं। रात को बात करेंगे।” मुस्कुराती हुई वो चली गई।


मुझे क्या पता था कि इसके पीछे सुमन भाभी का दिमाग था?


रात का इंतज़ार करते हुए मेरा लंड खड़ा रहा। दो बार मुठ मारने के बाद भी तनाव कम नहीं हुआ। रात दस बजे बसंती आई। रेशमी चोली, घाघरा और ओढ़नी में वो कमाल लग रही थी। उसके बदन से मादक खुशबू आ रही थी। उसने कहा, “सारी रात हमारी है। मैं यहीं सोने वाली हूँ।” और मुझसे लिपट गई। उसके कठोर स्तन मेरे सीने से टकराए। मैंने उसे बाँहों में जकड़ लिया।


वो बोली, “हाय दैया, इतना जोर से नहीं, हड्डियाँ टूट जाएँगी।” मेरे हाथ उसकी पीठ सहलाने लगे। उसने मेरे बालों में उंगलियाँ फिराईं और मेरा सिर नीचे खींचकर अपने होंठ मेरे होंठों से टिका दिए।


उसके नाज़ुक होंठ छूते ही मेरे बदन में करंट दौड़ गया। मेरा लंड तनकर और सख्त हो गया। ये मेरा पहला चुम्बन था। मैंने नहीं जाना कि क्या करना है। मेरे हाथ अपने आप उसकी पीठ से नीचे सरककर उसके नितंबों पर पहुँचे। पतले घाघरे में उसके भारी, गोल नितंब मानो नंगे ही थे। मैंने उन्हें सहलाया, दबाया। उसने नितंब हिलाए, तो मेरा लंड उसके पेट से टकराया।


कुछ देर तक होंठों से होंठ चिपकाए वो खड़ी रही। फिर उसने अपना मुँह खोला और जीभ से मेरे होंठ चाटे। मैंने भी मुँह खोला, तो उसने अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी। मेरी जीभ से उसकी जीभ खेलने लगी। फिर मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में डाली। उसने होंठ सिकोड़कर मेरी जीभ को पकड़ा और चूसी। मेरा लंड फटने को हो रहा था। उसने एक हाथ से मेरे लंड को टटोला। जैसे ही उसने लंड को मुट्ठी में लिया, उसका बदन नरम पड़ गया। वो खड़ी नहीं रह सकी। मैंने उसे सहारा देकर पलंग पर लिटाया। चुम्बन छोड़कर वो बोली, “हाय मंगल, पंद्रह दिन से मैं भूखी हूँ। मेरे पति मुझे रोज़ चोदते हैं, लेकिन यहाँ आने के बाद… जल्दी चोदो, मैं मरी जा रही हूँ।”


मुसीबत ये थी कि मुझे नहीं पता था कि लंड कहाँ और कैसे जाता है। फिर भी मैंने हिम्मत की। उसकी ओढ़नी उतारी, अपना पाजामा निकाला और उसकी बगल में लेट गया। वो इतनी उतावली थी कि चोली और घाघरा उतारने का सब्र नहीं हुआ। उसने फटाफट घाघरा ऊपर उठाया, जाँघें चौड़ी कीं और मुझे अपने ऊपर खींच लिया। मेरे कूल्हे अपने आप हिलने लगे। मेरा आठ इंच का लंड अंधे की लाठी की तरह इधर-उधर टकरा रहा था। उसने हमारे बदन के बीच हाथ डाला, लंड पकड़ा और अपनी भोस पर सेट किया। मेरे कूल्हे हिल रहे थे, लेकिन लंड भोस के मुँह तक नहीं पहुँच पा रहा था। आठ-दस धक्के खाली गए। हर बार लंड का मट्ठा फिसल जाता। मुझे लगा कि मैं बिना चोदे ही झड़ जाऊँगा। लंड और बसंती की भोस दोनों रस से तर-बतर हो गए थे। मेरी नाकामी पर बसंती हँस पड़ी। उसने फिर लंड पकड़ा, भोस के मुँह पर टिकाया और अपने नितंब ऐसे उठाए कि आधा लंड उसकी योनी में घुस गया। मैंने एक जोरदार धक्का मारा, तो पूरा लंड उसकी भोस में समा गया। लंड की टोपी खिसक गई, और चिकना मट्ठा भोस की दीवारों से कसकर जकड़ा गया। मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि मैं रुक नहीं सका। मेरे कूल्हे अपने आप तल्ली देने लगे। मेरा लंड अंदर-बाहर होने लगा, और बसंती की भोस को चोदने लगा। बसंती भी नितंब हिलाकर लंड लेने लगी। वो बोली, “आह… धीरे चोद, मंगल, वरना जल्दी झड़ जाएगा।”


मैंने कहा, “मैं नहीं चोदता, मेरा लंड चोदता है। और अभी वो मेरी सुन नहीं रहा।”


“हाय… मार डालेगा मुझे,” उसने कहा और भोस को सिकोड़कर लंड को दबोच लिया। उसने दोनों स्तनों को पकड़ा, मेरा मुँह अपने मुँह से चिपकाया। मैं बसंती को चोदता रहा। “आह… उह… मंगल, और जोर से… फाड़ दे मेरी भोस,” वो सिसकारियाँ लेने लगी।


धक्कों की रफ्तार रोक नहीं पाया। बीस-पच्चीस तल्लों के बाद मेरे बदन में आनंद की लहर दौड़ गई। आँखें जोर से बंद हो गईं, मुँह से लार टपकने लगी, हाथ-पाँव अकड़ गए, और लंड भोस की गहराई में ऐसा घुसा कि बाहर निकलने का नाम नहीं ले रहा था। लंड से गरम-गरम वीर्य की पिचकारियाँ छूटीं। हर पिचकारी के साथ मेरे बदन में झुरझुरी फैल गई। मैं होश खो बैठा।


जब होश आया, तो देखा कि बसंती की टाँगें मेरी कमर के आसपास और बाँहें मेरी गर्दन के आसपास जकड़ी थीं। मेरा लंड अभी भी तना हुआ था, और उसकी भोस फट-फट फटक रही थी। मैंने लंड निकाला और बगल में लेट गया।


“बाप रे,” वो बोली, “इतनी जबरदस्त चुदाई आज कई दिनों बाद हुई।”


“मैंने ठीक से चोदा?” मैंने पूछा।


“बहुत जबरदस्त,” उसने हँसकर कहा।


हम पलंग पर लेटे रहे। मैंने उसके स्तन पकड़े और दबाए। पतली चोली के आर-पार उसकी कड़ी निपल्स को मसला। उसने मेरा लंड टटोला और तना हुआ पाकर बोली, “वाह, ये तो अभी भी तना है। कितना लंबा और मोटा है, मंगल। जा, इसे धो के आ।”


मैं बाथरूम गया, पेशाब किया, लंड धोया और लौटा। मैंने कहा, “बसंती, मुझे तेरे स्तन और भोस दिखा। मैंने अब तक किसी की नहीं देखी।”


उसने चोली और घाघरा उतार दिया। उसके बड़े-बड़े गोल स्तन सीने पर उभरे हुए थे। दो इंच की काली अरेओला और छोटी-छोटी निपल्स। मैंने दोनों स्तनों को पकड़ा, सहलाया, दबाया और मसला। फिर उसने अपनी भोस दिखाई। मोटी मोन्स, बड़े-छोटे होंठ, लंबी क्लिटोरिस—सब कुछ। उसने मेरी दो उंगलियाँ भोस में डलवाकर उसकी गहराई और जी-स्पॉट दिखाया। बोली, “ये क्लिटोरिस मर्द के लंड जैसी होती है। चोदते वक्त ये भी कड़क हो जाती है। और भोस की दीवारें देखीं? कितनी खुरदरी हैं? लंड जब घिसता है, तो बहुत मज़ा आता है। लेकिन बच्चे के जन्म के बाद ये चिकनी हो जाती हैं, और भोस चौड़ी होकर पकड़ कम कर देती है।”


वो मेरे बगल में लेट गई। मेरा लंड थोड़ा नरम हो चला था। उसने लंड को मुट्ठी में लिया, टोपी खींचकर मट्ठा खोला और जीभ से चाटा। लंड तुरंत तन गया। उसने लंड मुँह में लिया और चूसने लगी। मुँह में जो हिस्सा था, उस पर जीभ फिराती थी। बाहर का हिस्सा मुट्ठी में पकड़कर मुठ मारती थी। दूसरे हाथ से मेरे वृषण सहलाती थी। मैं उसकी पीठ सहला रहा था।


मुठ मारने और भोस चोदने का मज़ा मैं ले चुका था, लेकिन लंड चुसवाने का मज़ा अलग था। वो भी उत्तेजित हो रही थी। लंड को मुँह से निकालकर वो मेरी जाँघों पर बैठ गई। जाँघें चौड़ी करके उसने भोस को लंड पर टिकाया। लंड का मट्ठा योनी के मुँह में फँसा, और उसने नितंब नीचे करके पूरा लंड अंदर ले लिया। उसकी मोन्स मेरी मोन्स से जुट गई।


“उह… मज़ा आ गया, मंगल। तेरे लंड का जवाब नहीं। मुँह में जितना मीठा लगता है, भोस में भी उतना ही,” उसने कहा और नितंब गोल-गोल घुमाकर लंड को अंदर-बाहर करने लगी। आठ-दस धक्कों में वो झड़ गई और ढल पड़ी। मैंने उसे बाँहों में लिया और पलटकर ऊपर आ गया। उसने टाँगें पसारीं और पाँव अड़ाए। मेरा लंड उसकी योनी की गहराई में उतर गया। उसकी भोस फट-फट करने लगी।


मैंने आधा लंड बाहर खींचा, रुका, और एक जोरदार धक्के से पूरा लंड भोस में घुसेड़ दिया। मोन्स से मोन्स टकराई, वृषण उसकी गांड से टकराए। “आह… मंगल, ऐसे ही चोद… फाड़ दे मेरी भोस,” वो चिल्लाई। मैंने पाँच-सात धक्के और मारे। उसका बदन हिलने लगा। वो बोली, “हाय… ऐसे ही… और जोर से… मेरी भोस को मार डाल।”


मैंने फ्री-स्टाइल में ताबड़तोड़ धक्के मारे। दस-पंद्रह धक्कों में वो फिर झड़ गई। उसने अपनी उंगली से क्लिटोरिस मसली और तीसरी बार झड़ी। उसकी योनी ने इतने जोर से संकुचन किए कि मेरा लंड दब गया। लंड की टोपी ऊपर-नीचे होने लगी, और मट्ठा फूल गया। मैं और बर्दाश्त नहीं कर सका। भोस की गहराई में लंड दबाकर मैं जोर से झड़ा। वीर्य की चार-पाँच पिचकारियाँ छूटीं, और मेरे बदन में झुरझुरी फैल गई। मैं ढल पड़ा।


उस रात के बाद बसंती रोज़ आती थी। हमें आधा-एक घंटा मिलता, जिसमें हम जमकर चुदाई करते। उसने मुझे कई तकनीकें और पोजीशन सिखाईं। मैंने सोचा था कि कम से कम एक महीना बसंती को चोदने का मज़ा लूँगा, लेकिन एक हफ्ते में ही वो ससुराल लौट गई।


असली खेल अब शुरू हुआ।


बसंती के जाने के तीन दिन तक कुछ नहीं हुआ। मैं उसकी भोस को याद करके मुठ मारता रहा। चौथे दिन मैं अपने कमरे में पढ़ने की कोशिश कर रहा था, एक हाथ में तना हुआ लंड पकड़े। तभी सुमन भाभी आ धमकी। मैंने जल्दी से लंड छोड़कर कपड़े ठीक किए और सीधा बैठ गया। वो सब समझती थी। मुस्कुराते हुए बोली, “कैसी चल रही है पढ़ाई, देवरजी? मैं कुछ मदद कर सकती हूँ?”


“भाभी, सब ठीक है,” मैंने कहा।


उनकी आँखों में शरारत थी। बोली, “पढ़ते वक्त हाथ में क्या पकड़ा था, जो मेरे आते ही छोड़ दिया?”


“नहीं, कुछ नहीं,” मैं हकलाया।


“तो मेरा लंड था, यही ना?” उन्होंने पूछा।


सुमन मुझे पहले से पसंद थीं। उनके मुँह से ‘लंड’ सुनकर मैं उत्तेजित हो गया। शर्म से नजरें नहीं मिला सका। कुछ बोला नहीं।


वो धीरे से बोली, “कोई बात नहीं। मैं समझती हूँ। लेकिन ये बता, बसंती को चोदना कैसा रहा? पसंद आई उसकी काली भोस? याद आती होगी ना?”


मेरे होश उड़ गए। सुमन को कैसे पता? क्या बसंती ने बता दिया? मैंने इनकार किया, “क्या बात करती हो, भाभी? मैंने कुछ नहीं किया।”


“अच्छा?” वो मुस्कराई। “तो वो यहाँ भजन करने आती थी?”


“वो यहाँ आई ही नहीं,” मैंने डरते-डरते कहा।


“तो ये बता, उसने सूखे वीर्य से अकड़ी निक्कर दिखाकर पूछा कि ये किसकी है, जो तेरे पलंग से मिली?”


मैं जोश में आ गया। बोला, “ऐसा हो ही नहीं सकता। उसने तो निक्कर पहनी ही नहीं थी।” और मैं रंगे हाथ पकड़ा गया।


मैंने कहा, “भाभी, क्या बात है? मैंने कुछ गलत किया?”


वो बोली, “वो तो तेरे भैया नक्की करेंगे।”


भैया का नाम सुनते ही मैं डर गया। मैंने सुमन से गिड़गिड़ाकर कहा कि भैया को कुछ न बताएँ। तब उन्होंने शर्त रखी और सारा भेद खोल दिया।


सुमन ने बताया कि भैया के वीर्य में शुक्राणु नहीं थे, और वो इससे अनजान थे। वो तीनों भाभियों को अच्छे से चोदते थे, ढेर सारा वीर्य भी छोड़ते थे, लेकिन बच्चा नहीं हो सकता था। सुमन चाहती थीं कि भैया चौथी शादी न करें। वो किसी भी तरह माँ बनना चाहती थीं। इसके लिए उन्हें मेरी जरूरत थी। बसंती को मेरे जाल में फँसाने का प्लान सुमन का ही था।


मैंने हँसकर कहा, “भाभी, इतना कष्ट करने की क्या जरूरत थी? तुम कहीं भी, कभी भी कहतीं, तो मैं तुम्हें चोदने से मना न करता। तुम ऐसी मस्त चीज हो।”


उनका चेहरा लाल हो गया। बोली, “रहने दे, जूते कहीं के। आए बड़े चोदने वाले। बसंती कहती थी कि तुम्हारी तो अभी नुन्नी है, जिसे भोस का रास्ता नहीं पता। सच्ची बात ना?”


मैंने कहा, “अभी दिखा दूँ, नुन्नी है या लंड?”


“ना बाबा, अभी नहीं। मुझे सब सावधानी से करना है। तू चुप रहे, मैं मौका देखकर आ जाऊँगी। तब देखेंगे कि तेरी नुन्नी है या लंड।”


दो दिन बाद भैया तीन दिन के लिए दूसरे गाँव गए। उनके जाने के बाद अगली दोपहर सुमन मेरे कमरे में आई। बोली, “कल रात तेरे भैया ने मुझे तीन बार चोदा। आज अगर मैं तुमसे गर्भवती हो जाऊँ, तो किसी को शक नहीं होगा। और दिन में आने की वजह भी यही है कि कोई शक न करे।”


वो मुझसे लिपट गई और फ्रेंच किस करने लगी। मैंने उनकी पतली कमर पर हाथ रखे। हमने जीभ लड़ाई। वो मेरी जीभ को होंठों के बीच चूसने लगी। मेरे हाथ उनके भारी नितंबों पर सरक गए। मैंने उनकी साड़ी और घाघरा ऊपर उठाना शुरू किया। वो मेरे लंड को सहलाती रहीं। मेरे हाथ उनके नंगे नितंबों पर फिसलने लगे। उन्होंने मेरे पाजामे की नाड़ी खोली और लंड को मुट्ठी में लिया।


मैं उन्हें पलंग पर ले गया और गोद में बिठाया। लंड को मुट्ठी में पकड़े वो फ्रेंच किस करती रहीं। मैंने उनके ब्लाउज के हुक खोले और ब्रा के ऊपर से स्तन दबाए। उन्होंने खुद ब्रा का हुक खोलकर उतार फेंकी। उनके शंकु आकार के छोटे, कड़े स्तन मेरी हथेलियों में समा गए। छोटी अरेओला और नोकदार निपल्स। मैंने निपल्स को चुटकी में लिया, तो वो बोली, “होले से, मंगल। मेरी निपल्स और क्लिटोरिस बहुत सेंसिटिव हैं। उंगली का स्पर्श सहन नहीं होता।” मैंने निपल्स को मुँह में लिया और चूसा। “आह… मंगल, धीरे… उह,” वो सिसकारी।


मैंने उन्हें लिटाया। उन्होंने घाघरा ऊपर उठाया, जाँघें चौड़ी कीं और पाँव अड़ाए। उनकी भोस देखकर मैं दंग रह गया। छोटी-सी, चौदह साल की लड़की जैसी। बस, काले झाँट और लंबी, मोटी क्लिटोरिस। मैं उनकी जाँघों के बीच आ गया। उन्होंने भोस के होंठ चौड़े किए। मैंने लंड पकड़कर भोस पर रगड़ा। उनके नितंब हिलने लगे। “आह… मंगल, अब तड़प मत, डाल दे,” वो बोली। मैंने लंड का मट्ठा भोस के मुँह में सेट किया और धीरे से अंदर डाला। भोस ने लंड को कस लिया। मैंने कूल्हों से जोरदार धक्का मारा। पूरा लंड भोस में उतर गया। मोन्स से मोन्स टकराई। लंड तमकने लगा, और भोस फट-फट करने लगी। “उह… मंगल, कितना मोटा लंड है… आह… चोद दे मुझे,” वो सिसकारी।


मैं उत्तेजित था। पूरा लंड खींचकर जोरदार धक्कों से चोदने लगा। वो भोस उठा-उठाकर साथ देने लगी। भोस और लंड से चिकना रस बहने लगा। “आह… उह… मंगल, और जोर से… फाड़ दे मेरी भोस,” उनकी सिसकारियों और भोस की पूच्च-पुच्च आवाज से कमरा गूँज उठा।


बीस मिनट तक मैंने उनकी भोस मारी। वो दो बार झड़ीं। आखिर में उनकी भोस ने ऐसा सिकोड़ा कि लंड की टोपी छड़छड़ाने लगी। मैं बर्दाश्त नहीं कर सका। लंड को भोस की गहराई में दबाकर मैं जोर से झड़ा। वीर्य की पिचकारियों से मेरा बदन काँप गया। लंड निकाला, जो अभी भी तना था। सुमन टाँगें उठाए दस मिनट तक लेटी रहीं, ताकि वीर्य बाहर न निकले।


उस दिन के बाद भैया के लौटने तक सुमन रोज़ मुझसे चुदवाती रहीं। नसीब से वो गर्भवती हो गईं। परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। भैया सीना तानकर मूँछें मरोड़ने लगे। सविता और चंपा भाभी की हालत और खराब हो गई। सुमन ने गर्भावस्था का बहाना बनाकर भैया से चुदवाना बंद कर दिया, लेकिन मुझसे नहीं। भैया को मजबूरी में सविता और चंपा को चोदना पड़ता था।


जिस दिन भैया सुमन को डॉक्टर के पास ले गए, उसी शाम वो मेरे पास आई। घबराते हुए बोली, “मंगल, मुझे डर है कि सविता और चंपा को हमारे बारे में शक हो रहा है।”


मैं पसीने-पसीने हो गया। अगर भैया को पता चला, तो वो हमें मार डालेंगे। मैंने पूछा, “अब क्या करें?”


वो बोली, “एक ही रास्ता है। तुझे सविता और चंपा को भी चोदना होगा। चोदेगा?”


“भाभी, तुम्हें चोदने के बाद किसी और को चोदने का मन नहीं करता। लेकिन तुम जो कहो, वही करूँगा।”


सुमन ने प्लान बनाया। रात को जिस भाभी को भैया चोदें, वो अगले दिन मेरे पास आए। शक न हो, इसलिए तीनों मेहमान वाले घर में एक साथ आएँगी, लेकिन मैं एक को ही चोदूँगा।


कुछ दिन बाद चंपा भाभी की बारी आई। उनकी माहवारी को तेरह दिन हो चुके थे। चंपा की उम्र थी छब्बीस साल। पाँच फीट चार इंच की लंबाई, पचपन किलो वजन, साँवला रंग, भरे हुए नितंब, मध्यम आकार के स्तन, जो गोल और भारी थे। चेहरा साधारण, लेकिन उनकी मुस्कान में गजब की कशिश थी।


वो मेरे कमरे में आई और कपड़े उतारने लगी। मैंने कहा, “भाभी, ये मुझे करने दे।” उसे बाँहों में लेकर मैंने फ्रेंच किस किया। वो तड़प उठी। “आह… मंगल, धीरे,” वो सिसकारी। मैंने उसे खूब चूमा। उसका बदन ढीला पड़ गया। उसे पलंग पर लिटाकर मैंने धीरे-धीरे उसके सारे कपड़े उतारे। मेरा मुँह एक निपल पर टिका, एक हाथ दूसरा स्तन दबाने लगा, दूसरा हाथ उसकी क्लिटोरिस से खेलने लगा। “उह… मंगल, कितना मज़ा दे रहा है,” वो सिसकारी। थोड़ी देर में वो गरम हो गई। उसने खुद टाँगें उठाईं और चौड़ी कीं। मैंने लंड का मट्ठा भोस की दरार में रगड़ा। उसके नितंब डोलने लगे। शर्म से उसने आँखों पर हाथ रख लिया। मैंने लंड को भोस के मुँह पर टिकाया और धीरे से अंदर डाला। चंपा की भोस सुमन जितनी टाइट नहीं थी, लेकिन लंड पर अच्छी पकड़ थी। मैंने धीरे-धीरे धक्के मारे। “आह… मंगल, और गहरा… उह… चोद दे,” वो सिसकारती रही। आधे घंटे तक मैंने उसे चोदा। वो दो बार झड़ी। आखिर में वो मुझसे लिपट गई और मेरे साथ जोर से झड़ी। मैंने भी वीर्य की पिचकारी छोड़ी और उतर गया।


अगले दिन सुमन आई और बोली, “चंपा तेरी चुदाई से बहुत खुश है। उसने कहा, जब चाहे उसे चोद सकता है।”


सविता भाभी की बारी के लिए पंद्रह दिन इंतज़ार करना पड़ा। सविता तीस साल की थीं। पाँच फीट छह इंच की लंबाई, साठ किलो वजन, गोरा रंग, भरे हुए स्तन और नितंब। चेहरा मातृवत, लेकिन बदन में गजब की कसावट। मैंने उन्हें हमेशा माँ की तरह देखा था, इसलिए उनकी चुदाई का ख्याल मुझे अच्छा नहीं लगता था। लेकिन और कोई रास्ता नहीं था।


हम अकेले हुए, तो सविता ने आँखें बंद कर लीं। मेरा मुँह उनके स्तन पर चिपक गया। बाद में पता चला कि उनके स्तन उनकी कमजोरी थे। मैंने एक निपल चूसना शुरू किया, तो उनकी भोस ने रस का फव्वारा छोड़ दिया। “आह… मंगल, धीरे… बहुत मज़ा आ रहा है,” वो सिसकारी। मेरा लंड आधा तना था। मैंने लंड को भोस के मुँह पर टिकाया, लेकिन आसानी से नहीं घुसा। सविता ने भोस सिकोड़ी, तो लंड ने जवाब दिया। मैंने उनके पाँव अपने कंधों पर लिए और लंबे तल्लों से चोदने लगा। सविता की भोस ज्यादा टाइट नहीं थी, लेकिन वो संकुचन करके लंड को दबाना जानती थी। “उह… मंगल, और जोर से… फाड़ दे मेरी भोस,” वो चिल्लाई। बीस मिनट की चुदाई में वो दो बार झड़ी। मैंने भी वीर्य छोड़ा और उतर गया।


अगले दिन सुमन ने बताया कि सविता भी मेरी चुदाई से खुश थी। तीनों भाभियों ने मुझे चोदने की इजाजत दे दी थी।


हम चारों में समझौता हुआ कि ये राज़ कोई नहीं खोलेगा। सुमन ने भैया से चुदवाना बंद कर दिया, लेकिन मुझसे नहीं। मैं एक-एक करके तीनों को चोदता रहा। भगवान की कृपा से सविता और चंपा भी गर्भवती हो गईं। भैया की खुशी का ठिकाना न रहा।


समय आने पर सुमन और सविता ने बेटों को जन्म दिया, चंपा ने बेटी को। भैया ने बड़ी दावत दी और गाँव में मिठाई बाँटी। कोई मुझे याद नहीं करता था। बसंती भी ससुराल से लौट आई थी, और हमारी नियमित चुदाई चल रही थी। मैंने शादी न करने का फैसला कर लिया।


सबका संसार आनंद से चल रहा था, लेकिन मेरे लिए एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई। भैया बच्चों को बहुत प्यार करते थे, लेकिन जब वो उन्हें मारते, तो मेरा खून खौल उठता। मैं चाहता था कि उनके हाथ पकड़ लूँ और चिल्लाऊँ, “रहने दो, खबरदार मेरे बच्चों को हाथ लगाया तो।” लेकिन ऐसी हिम्मत मैं अब तक नहीं जुटा पाया।


आपको ये Hindi Sex Stories कैसी लगी? क्या मंगल को अपने बच्चों के लिए भैया से बात करनी चाहिए? कमेंट में बताएँ।

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