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ट्रेन की चादर के नीचे भाभी की बहन ने चूत मरवाई - Indian Sex Stories

मेरा नाम करण है, मैं 27 साल का हूं, मुंबई में नौकरी करता हूं। पिछले महीने भाई और भाभी की शादी की सालगिरह मनाने गांव जा रहा था। ट्रेन बहुत लेट थी, रात के ग्यारह बज चुके थे जब मैं स्लीपर कोच में चढ़ा।


मेरा टिकट RAC था, कन्फर्म बर्थ नहीं थी। S4 कोच में लोअर बर्थ 28 दिखाया गया था, लेकिन वहां पहले से एक अधेड़ अंकल सो रहे थे। मैं इधर-उधर जगह ढूंढ रहा था कि नजर साइड लोअर बर्थ पर पड़ी। वहां एक लड़की अकेली बैठी थी, चादर ओढ़े मोबाइल देख रही थी। सामने की अपर और मिडिल बर्थ दोनों खाली थीं।


मैंने पास खड़े TTE से पूछा। उसने चार्ट देखा और बोला, “साइड लोअर पर वो लड़की अकेली है, उससे पूछ लो, शायद एडजस्ट कर ले।” मैं सामान लेकर उसके पास गया और धीरे से बोला, “एक्सक्यूज मी, मेरा RAC है, TTE ने कहा यहां पूछ लूं। अगर तकलीफ न हो तो थोड़ी जगह मिल जाएगी?”


वो ऊपर देखी। आंखें चमक उठीं। अरे, ये तो रिया थी—भाभी की छोटी बहन। वो भी मुझे तुरंत पहचान गई। मुस्कुराते हुए बोली, “करण भैया! अरे वाह, बिल्कुल बैठिए ना। मैं अकेली हूं, रात में डर भी लग रहा था। अब आप आ गए तो अच्छा हुआ।”


अगर अनजान लड़की होती तो शायद मना कर देती, लेकिन रिया मुझे जानती थी। भाभी की अपनी सगी छोटी बहन थी, और मैं भाभी का देवर। इसलिए वो फौरन राजी हो गई। मैंने बैग ऊपर रखा और उसके बगल में बैठ गया। हमने एक ही चादर मिलकर ओढ़ ली—ठंड से बचने के बहाने और थोड़ी प्राइवेसी के लिए।


लाइट्स ऑफ हो गईं। कोच में अंधेरा छा गया। ट्रेन की हर कंपन में हमारी जांघें आपस में सट रही थीं। उसकी गर्माहट मेरी त्वचा पर महसूस हो रही थी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। कितने साल से रिया मेरे खयालों में घूमती थी—भाभी की शादी के समय से ही उसकी हंसी, भरे हुए बूबे, वो शरमाती नजरें मुझे परेशान करती थीं।


रिया ने खुद चादर मेरी तरफ खींची और फुसफुसाई, “भैया, ठंड लग रही है, पास आ जाइए ना।” मैं पास सरक गया। अब हमारी जांघें पूरी तरह चिपक गई थीं। बातें शुरू हुईं। वो बोली कि मंगेतर दिल्ली में है, लंबी दूरी की रिलेशनशिप में अकेलापन बहुत सताता है। मैंने मजाक में कहा, “मुझे तो कोई है ही नहीं, फिर भी रातें काटना मुश्किल हो जाता है।” वो हंस पड़ी, लेकिन उसकी हंसी में कुछ और था—जैसे वो भी वही अकेलापन महसूस कर रही हो।


रात के एक बज चुके थे। मैंने धीरे से उसका हाथ पकड़ा। वो नहीं चौंकी, बल्कि उंगलियां मेरी उंगलियों में उलझा दीं, जैसे सालों का इंतजार खत्म हो रहा हो। ट्रेन की कंपन में हमारा हाथ रगड़ खा रहा था, पसीना चिपचिपा होकर मिल रहा था। मेरे दिमाग में बस एक खयाल घूम रहा था—अगर जांघ पर हाथ रखूं तो क्या भाभी की बहन मुझे रोक लेगी? हिम्मत करके सरका दिया। कुर्ती के ऊपर से उसकी नरम, गर्म जांघ पर। वो हल्की सी कांपी, लेकिन हाथ नहीं हटाया।


मैंने कान में फुसफुसाया, “रिया, तुम पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई हो।” वो शर्मा गई, सांसें तेज हो गईं। बोली, “भैया, आप भी बहुत हैंडसम हो। दीदी हमेशा आपकी तारीफ करती हैं।” मैंने उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाया और होंठों पर किस कर लिया। पहले वो हिचकिचाई, फिर जीभ अंदर सरका दी। हमारी जीभें आपस में उलझ गईं, लार मिल रही थी। मेरा हाथ उसके बूबों पर चला गया। कितने मुलायम और भरे हुए थे। कुर्ती के अंदर हाथ डालकर ब्रा के ऊपर से दबाया। वो सिसकारी, “आह भैया… उफ्फ… तेरे हाथ कितने गरम हैं…”


मैंने ब्रा ऊपर की और एक निप्पल मुंह में ले लिया। जोर से चूसने लगा। वो मेरे बाल पकड़कर दबाने लगी, “ओह्ह भैया… आह ह ह… चूसो ना मेरे निप्पल्स को जोर से… इह्ह…” दूसरा हाथ सलवार के नाड़े में डाल दिया। पैंटी पूरी गीली थी। भाभी की बहन की चूत की मादक, मिट्टी जैसी महक ट्रेन की बंद हवा में फैल रही थी, मेरे लंड को और सख्त कर रही थी।


मैंने पहले क्लिट पर उंगली से हल्के-हल्के सर्कल बनाए। वो कमर उचकाने लगी, “आह भैया… ऐसे ही रगड़ो… मेरी चूत को और गीला कर रहे हो…” फिर दो उंगलियां उसकी टाइट, रसीली चूत में सरका दीं। अंदर की गर्मी ने मुझे पागल कर दिया—वो दीवारें मेरी उंगलियों को कसकर जकड़ रही थीं। अंदर-बाहर करने लगा, स्पीड बढ़ाते हुए। उसका रस मेरी हथेली पर बह रहा था। वो मेरे कंधे में नाखून गड़ा रही थी, “ओह्ह भैया… और गहरा… आअह्ह्ह… ह्हीईईई… ऊउइइ…” अचानक उसकी चूत से फव्वारा सा छूटा, चादर गीली हो गई। पहली बार किसी की चूत ने ऐसे फुहार मारी थी।


अब उसकी बारी थी। वो पैंट की चेन खोलकर लंड बाहर निकाल लिया। पत्थर जैसा खड़ा था। वो बोली, “वाह भैया… कितना मोटा और गरम… दीदी के देवर का लंड कितने दिन से कल्पना में था।” पहले टिप पर जीभ घुमाई, प्रीकम चाटते हुए, “उम्म… कितना स्वादिष्ट है तेरा रस…” फिर मुंह में लिया। ग्ग्ग्ग… ग्ग्ग्ग… गी.. गी.. गों.. गों.. गोग… गले तक ले रही थी, आंखें नम हो गईं लेकिन रुकी नहीं। हाथ से बॉल्स मसल रही थी। मैं बाल पकड़कर हल्का धक्का दे रहा था। उसकी गर्म, गीली जीभ मुझे पागल कर रही थी। मैं झड़ गया, मुंह में ही। उसने सब पी लिया।


थोड़ी देर लिपटकर लेटे रहे। लेकिन लंड फिर तन गया। रिया बोली, “भैया… अब अंदर चाहिए… भाभी की बहन की चूत तेरे लंड के लिए सालों से तड़प रही थी।” मैंने चादर ऊपर की, सलवार-पैंटी नीचे की। वो मेरे ऊपर चढ़ गई। लंड को चूत पर रगड़ा और धीरे से बैठ गई। “आआह्ह्ह… भैया… कितना मोटा है… फाड़ रहा है…” वो ऊपर-नीचे होने लगी। ट्रेन की हर झटके में लंड और गहरा घुस रहा था। मैं बूबे दबा रहा था, वो होंठ चूम रही थी, “ओह्ह… ह्हा… ऐसे ही पेलो…”


फिर मैंने नीचे लिटाया। मिशनरी में टांगें कंधों पर रखीं और जोर-जोर से पेलने लगा। चपचप… चपचप… की आवाज ट्रेन की आवाज में दब रही थी। वो बोली, “भैया… जोर से… मैं तेरी रंडी बनकर झड़ना चाहती हूं… ऊईईई… हां फाड़ दो मेरी चूत…” वो फिर झड़ गई, जोर से कांपकर।


अब डॉगी बनाया। पीछे से कमर पकड़ी और एक झटके में ठोक दिया। वो चादर में मुंह दबाकर चिल्लाई। मैंने गांड पर थप्पड़ मारे और ठुकाई शुरू की। ट्रेन के एक जोरदार झटके ने लंड और गहरा धकेल दिया। वो मुस्कुराई, “आह… ये झटका तो जन्नत जैसा…” मैंने भी कंट्रोल खोया और चूत में ही झड़ गया। गरम माल अंदर भर दिया।


पसीने से तर, चादर के नीचे लिपटे रहे। वो बोली, “भैया, तेरे माल की गर्मी अभी भी मेरी चूत में महसूस हो रही है… दीदी को कभी पता नहीं चलेगा।” मैंने बालों में किस किया, “ये तो शुरुआत है रिया, गांव पहुंचकर और चोदूंगा।”


सुबह तक हम तीन बार और चुदाई कर चुके थे। एक बार वो ऊपर चढ़कर वाइल्डली ग्राइंडिंग की, एक बार खड़े-खड़े बर्थ की दीवार से सटाकर पेला। ट्रेन की वो रात मेरी जिंदगी की सबसे हॉट रात बन गई। अब भी ट्रेन में चढ़ता हूं तो भाभी की बहन की याद आती है और लंड खड़ा हो जाता है।


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Rajesh Singh
Rajesh Singh
09 जन॰

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